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OCN Research Desk · भारतीय संसदीय लोकतंत्र

भारत का पाँचवाँ लोकसभा चुनाव 1971 : इंदिरा गांधी, कांग्रेस का विभाजन और ‘गरीबी हटाओ’ की विजय

राज्यवार सीटें, दलवार नतीजे और मत प्रतिशत, प्रमुख नेता तथा चुनावी घटनाक्रम

ओमकार चौधरी / OCN Research Deskस्वतंत्र शोध अध्याय · 27 अक्टूबर 2026
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भारत का पाँचवाँ लोकसभा आम चुनाव मार्च 1971 में हुआ। यह स्वतंत्र भारत का पहला मध्यावधि लोकसभा चुनाव था। चौथी लोकसभा का कार्यकाल 1972 तक चलना था, लेकिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने दिसंबर 1970 में लोकसभा भंग करने की सिफारिश की और समय से पहले चुनाव कराए गए।

इस चुनाव की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दो हिस्सों में बँट चुकी थी। इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस और पुराने संगठनात्मक नेतृत्व वाली कांग्रेस (संगठन) एक-दूसरे के विरुद्ध मैदान में थीं।

इंदिरा गांधी ने ‘गरीबी हटाओ’ के नारे के साथ चुनाव लड़ा, जबकि कांग्रेस (संगठन), जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी ने मिलकर कांग्रेस विरोधी महागठबंधन बनाया।

परिणाम में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने 518 में से 352 सीटें और 43.68 प्रतिशत मत हासिल किए। कांग्रेस (संगठन) को 10.43 प्रतिशत मत मिलने के बावजूद केवल 16 सीटें मिलीं। भारतीय जनसंघ 22 और स्वतंत्र पार्टी आठ सीटों पर सिमट गई।

कुल लोकसभा सीटें
518
इंदिरा कांग्रेस की सीटें
352
कांग्रेस का वोट शेयर
43.68%
मतदान प्रतिशत
55.27%

स्रोत: भारत निर्वाचन आयोग, Statistical Report on General Elections, 1971, Fifth Lok Sabha, खंड I, पृष्ठ 3–5 एवं 76।

1. पाँचवें लोकसभा चुनाव के महत्वपूर्ण आँकड़े

चुनाव संबंधी तथ्यविवरण
चुनाव वर्ष1971
मुख्य मतदानमार्च 1971
लोकसभापाँचवीं
निर्वाचित लोकसभा सीटें518
बहुमत का आँकड़ा260
पंजीकृत मतदाता27,41,89,132
मतदान करने वाले15,15,36,802
मतदान प्रतिशत55.27%
कुल उम्मीदवार2,784
चुनाव मैदान में राजनीतिक दल53
राष्ट्रीय दल8
राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त दल17
अन्य पंजीकृत दल28
निर्दलीय उम्मीदवार1,134
महिला प्रत्याशी86
कांग्रेस की सीटें352
कांग्रेस का राष्ट्रीय मत प्रतिशत43.68%
प्रधानमंत्रीइंदिरा गांधी
सबसे बड़ा विपक्षी दलमार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी — 25 सीटें

निर्वाचन आयोग की रिपोर्ट में 406 सामान्य, 76 अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित और 36 अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित लोकसभा सीटें दर्ज हैं।

2. चुनाव से पहले कांग्रेस का विभाजन क्यों हुआ?

1967 के चुनाव के बाद कांग्रेस के भीतर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और संगठन के शक्तिशाली नेताओं के बीच मतभेद बढ़ गए थे। इन नेताओं को आमतौर पर ‘सिंडिकेट’ कहा जाता था। इनमें के. कामराज, एस. निजलिंगप्पा, अतुल्य घोष और एस. के. पाटिल जैसे वरिष्ठ नेता प्रमुख थे।

1969 में तीन घटनाओं ने इस संघर्ष को निर्णायक मोड़ दिया।

पहली घटना — बैंकों का राष्ट्रीयकरण: 19 जुलाई 1969 को 14 प्रमुख वाणिज्यिक बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। यह इंदिरा गांधी की आर्थिक नीतियों और राजनीतिक अभियान का प्रमुख विषय बना।

दूसरी घटना — राष्ट्रपति चुनाव: 1969 में कांग्रेस संगठन ने नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया। इंदिरा गांधी ने औपचारिक पार्टी उम्मीदवार के बजाय अंतरात्मा की आवाज पर मतदान करने की अपील की। निर्दलीय उम्मीदवार वी. वी. गिरि चुनाव जीत गए।

तीसरी घटना — कांग्रेस में टूट: नवंबर 1969 में पार्टी दो खेमों में बँट गई। एक ओर इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाला कांग्रेस गुट था, दूसरी ओर कांग्रेस (संगठन)।

1971 के निर्वाचन आयोग के अभिलेखों में इंदिरा गांधी की पार्टी को INC और कांग्रेस (संगठन) को NCO के संकेताक्षर से दर्ज किया गया है।

3. कौन-कौन से दल चुनाव मैदान में थे और उनके नेता कौन थे?

1971 में आठ राष्ट्रीय दल चुनाव मैदान में थे। उनके अलावा डीएमके, तेलंगाना प्रजा समिति, भारतीय क्रांति दल, केरल कांग्रेस, मुस्लिम लीग और दूसरे क्षेत्रीय दल भी चुनाव लड़ रहे थे।

राजनीतिक दलप्रमुख नेता
कांग्रेस — इंदिरा गांधी गुटइंदिरा गांधी, जगजीवन राम
कांग्रेस (संगठन)एस. निजलिंगप्पा, मोरारजी देसाई, के. कामराज
भारतीय जनसंघअटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, बलराज मधोक
स्वतंत्र पार्टीसी. राजगोपालाचारी, मीनू मसानी, एन. जी. रंगा
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टीजॉर्ज फर्नांडिस, राजनारायण, मधु लिमये
प्रजा सोशलिस्ट पार्टीसमर गुहा सहित वरिष्ठ समाजवादी नेता
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीएस. ए. डांगे, सी. राजेश्वर राव
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टीपी. सुंदरैया, ई. एम. एस. नंबूदरीपाद, ए. के. गोपालन
डीएमकेएम. करुणानिधि
तेलंगाना प्रजा समितिमर्री चेन्ना रेड्डी
भारतीय क्रांति दलचौधरी चरण सिंह
शिरोमणि अकाली दलसंत फतेह सिंह
केरल कांग्रेसके. एम. जॉर्ज और के. एम. मणि से जुड़ा नेतृत्व
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीगसी. एच. मोहम्मद कोया तथा केरल नेतृत्व
बंगला कांग्रेसअजय कुमार मुखर्जी
उत्कल कांग्रेसबीजू पटनायक
फॉरवर्ड ब्लॉकचित्त बसु सहित वरिष्ठ नेता
रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टीत्रिदीब चौधरी

इस सूची में संगठनात्मक अध्यक्षों के साथ संस्थापक और प्रभावशाली राजनीतिक नेता शामिल हैं; सभी नाम 1971 में औपचारिक पार्टी अध्यक्ष नहीं थे।

4. किस दल को कितनी सीटें मिलीं और कितना वोट शेयर?

यह राष्ट्रीय चुनाव परिणाम की सबसे महत्वपूर्ण तालिका है।

राजनीतिक दलसीटेंराष्ट्रीय वोट शेयर
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (इंदिरा)35243.68%
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी255.12%
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी234.73%
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम233.84%
भारतीय जनसंघ227.35%
कांग्रेस (संगठन)1610.43%
तेलंगाना प्रजा समिति101.28%
स्वतंत्र पार्टी83.07%
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी32.43%
केरल कांग्रेस30.37%
रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी30.49%
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी21.04%
फॉरवर्ड ब्लॉक20.66%
मुस्लिम लीग20.28%
भारतीय क्रांति दल12.18%
शिरोमणि अकाली दल10.87%
उत्कल कांग्रेस10.72%
बंगला कांग्रेस10.35%
विशाल हरियाणा पार्टी10.24%
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया1लगभग 0.10%
ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस10.06%
ऑल इंडिया झारखंड पार्टी1लगभग 0.19%
यूनाइटेड फ्रंट ऑफ नगालैंड10.06%
यूनाइटेड गोअन्स (सेक्वेरा)10.04%
निर्दलीय148.38%

दलों का प्रतिशत पूरे देश में प्राप्त वैध मतों का हिस्सा है। सूची में शून्य सीट पाने वाले दल नहीं हैं। निर्वाचन आयोग, राष्ट्रीय दलवार मत और सीटें, पृष्ठ 76, 85–87।

यहाँ तीन बातें उल्लेखनीय हैं। कांग्रेस (संगठन) को 10.43 प्रतिशत वोट मिले, फिर भी उसे केवल 16 सीटें मिलीं। भारतीय जनसंघ को 7.35 प्रतिशत मत मिले और 22 सीटें मिलीं। वहीं डीएमके ने मात्र 3.84 प्रतिशत राष्ट्रीय वोट शेयर के साथ 23 सीटें जीतीं क्योंकि उसके मत तमिलनाडु में केंद्रित थे।

5. किस राज्य में कितनी लोकसभा सीटें थीं और कांग्रेस का प्रदर्शन कैसा रहा?

1971 में कुल 27 राज्य एवं केंद्रशासित चुनावी इकाइयों में लोकसभा सीटों का वितरण था। तमिलनाडु अब आधिकारिक नाम था, जबकि वर्तमान कर्नाटक को उस समय मैसूर कहा जाता था। हिमाचल प्रदेश को जनवरी 1971 में पूर्ण राज्य का दर्जा मिल चुका था।

तत्कालीन राज्य / केंद्रशासित प्रदेशकुल सीटेंइंदिरा कांग्रेसअन्य
उत्तर प्रदेश857312
बिहार533914
महाराष्ट्र45423
आंध्र प्रदेश412813
पश्चिम बंगाल401327
तमिलनाडु39930
मध्य प्रदेश372116
मैसूर (कर्नाटक)27270
गुजरात241113
राजस्थान23149
उड़ीसा (ओडिशा)20155
केरल19613
असम14131
पंजाब13103
हरियाणा972
दिल्ली770
जम्मू-कश्मीर651
हिमाचल प्रदेश440
त्रिपुरा202
मणिपुर220
गोवा, दमन और दीव211
नगालैंड101
अंडमान एवं निकोबार110
चंडीगढ़110
दादरा एवं नगर हवेली110
लक्षद्वीप समूह110
पांडिचेरी (पुडुचेरी)110
कुल518352166

मूल स्रोत: निर्वाचन आयोग, 1971 लोकसभा चुनाव, Seats Won in States/UTs by Parties, पृष्ठ 81–84।

राज्यवार अन्य प्रमुख दलों को कितनी सीटें मिलीं?

राज्यप्रमुख विपक्षी तथा सहयोगी दलों के परिणाम
उत्तर प्रदेशजनसंघ 4, भाकपा 4, भारतीय क्रांति दल 1, कांग्रेस (संगठन) 1, निर्दलीय 2
बिहारभाकपा 5, कांग्रेस (संगठन) 3, जनसंघ 2, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी 2, झारखंड पार्टी 1, निर्दलीय 1
महाराष्ट्रप्रजा सोशलिस्ट पार्टी 1, फॉरवर्ड ब्लॉक 1, रिपब्लिकन पार्टी 1
आंध्र प्रदेशतेलंगाना प्रजा समिति 10, भाकपा 1, माकपा 1, निर्दलीय 1
पश्चिम बंगालमाकपा 20, भाकपा 3, बंगला कांग्रेस 1, प्रजा सोशलिस्ट 1, आरएसपी 1, निर्दलीय 1
तमिलनाडुडीएमके 23, भाकपा 4, कांग्रेस (संगठन) 1, फॉरवर्ड ब्लॉक 1, निर्दलीय 1
मध्य प्रदेशजनसंघ 11, निर्दलीय 4, संयुक्त सोशलिस्ट 1
गुजरातकांग्रेस (संगठन) 11, स्वतंत्र पार्टी 2
राजस्थानजनसंघ 4, स्वतंत्र पार्टी 3, निर्दलीय 2
उड़ीसास्वतंत्र पार्टी 3, भाकपा 1, उत्कल कांग्रेस 1
केरलकेरल कांग्रेस 3, भाकपा 3, माकपा 2, मुस्लिम लीग 2, आरएसपी 2, निर्दलीय 1
पंजाबभाकपा 2, अकाली दल 1
हरियाणाजनसंघ 1, विशाल हरियाणा पार्टी 1
असमऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस 1
त्रिपुरामाकपा 2

6. पाँचवें चुनाव के छह महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाक्रम

1. ‘गरीबी हटाओ’ बनाम ‘इंदिरा हटाओ’

इंदिरा गांधी ने गरीबी उन्मूलन, बैंक राष्ट्रीयकरण और आर्थिक सुधारों को चुनाव प्रचार का केंद्र बनाया। दूसरी ओर विपक्षी महागठबंधन ने इंदिरा गांधी की सत्ता को चुनौती देने के उद्देश्य से संयुक्त अभियान चलाया। ‘गरीबी हटाओ’ चुनाव का सबसे प्रसिद्ध नारा बना।

2. कांग्रेस (संगठन) की पराजय

मोरारजी देसाई और अन्य वरिष्ठ नेताओं वाली कांग्रेस (संगठन) ने 238 उम्मीदवार उतारे। दल को 1.52 करोड़ से अधिक वोट मिले, लेकिन केवल 16 उम्मीदवार जीत पाए। गुजरात में उसने 11 सीटें जीतीं और इंदिरा कांग्रेस के बराबर पहुँची।

3. भारतीय जनसंघ को सीटों का नुकसान

1967 में जनसंघ ने 35 लोकसभा सीटें जीती थीं। 1971 में उसकी संख्या घटकर 22 रह गई। राष्ट्रीय मत प्रतिशत 9.31 से घटकर 7.35 प्रतिशत हुआ। मध्य प्रदेश में 11 और उत्तर प्रदेश में चार सीटें मिलीं।

4. तमिलनाडु में डीएमके का प्रभाव

एम. करुणानिधि के नेतृत्व वाली डीएमके ने तमिलनाडु की 39 लोकसभा सीटों में से 23 जीतीं। इंदिरा कांग्रेस और डीएमके ने चुनावी तालमेल किया था। कांग्रेस (संगठन) को राज्य में केवल एक सीट मिली।

5. तेलंगाना प्रजा समिति की सफलता

पृथक तेलंगाना राज्य की माँग से जुड़े आंदोलन की पृष्ठभूमि में तेलंगाना प्रजा समिति ने आंध्र प्रदेश में दस लोकसभा सीटें जीतीं। राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी को केवल 1.28 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन क्षेत्रीय जनाधार के कारण वह दस सांसद भेजने में सफल रही।

6. चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व वाले भारतीय क्रांति दल को 2.18 प्रतिशत राष्ट्रीय मत मिले, लेकिन सिर्फ एक लोकसभा सीट मिली। उत्तर प्रदेश में दल को लगभग 12.70 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। यह किसान-केंद्रित राजनीति के विस्तार का महत्वपूर्ण दौर था।

7. रायबरेली में इंदिरा गांधी बनाम राजनारायण : चर्चित मुकाबला

1971 के चुनाव में सबसे चर्चित निर्वाचन क्षेत्रों में उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट भी थी। यहाँ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का मुकाबला संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के राजनारायण से हुआ।

उम्मीदवारपार्टीप्राप्त मतवोट प्रतिशत
इंदिरा गांधीकांग्रेस1,83,30966.35%
राजनारायणसंयुक्त सोशलिस्ट पार्टी71,49925.88%
स्वामी अद्वैतानंदनिर्दलीय16,6276.02%
रामेश्वर दत्त मानवआरएसपी (एमएल)4,8391.75%

इंदिरा गांधी की जीत का अंतर

1,11,810 वोट

इस चुनाव से आपातकाल तक क्या हुआ?

राजनारायण ने इंदिरा गांधी के चुनाव को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में चुनौती दी।

12 जून 1975 को न्यायमूर्ति जगमोहन लाल सिन्हा ने चुनावी कदाचार के आधार पर इंदिरा गांधी का निर्वाचन निरस्त कर दिया। यह फैसला देश की राजनीति में गंभीर संवैधानिक और राजनीतिक संकट का कारण बना।

25 जून 1975 की रात देश में आंतरिक आपातकाल लागू करने की घोषणा हुई। 1977 के अगले लोकसभा चुनाव में रायबरेली से राजनारायण ने इंदिरा गांधी को पराजित कर दिया।

इस प्रकार 1971 का रायबरेली चुनाव आगे चलकर भारतीय राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण न्यायिक और राजनीतिक घटनाओं से जुड़ गया।

8. क्या बांग्लादेश युद्ध का 1971 के चुनाव पर प्रभाव पड़ा था?

यहाँ घटनाओं की तारीखों को अलग रखना महत्वपूर्ण है।

  • मार्च 1971 — भारत में पाँचवाँ लोकसभा चुनाव हुआ।
  • 25 मार्च 1971 — पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया।
  • 26 मार्च 1971 — बांग्लादेश की स्वतंत्रता की घोषणा हुई।
  • 3 दिसंबर 1971 — भारत और पाकिस्तान के बीच पूर्ण युद्ध शुरू हुआ।
  • 16 दिसंबर 1971 — ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया।

अर्थात दिसंबर 1971 में हुआ भारत-पाकिस्तान युद्ध मार्च 1971 के लोकसभा चुनाव का कारण नहीं था। इंदिरा गांधी की 1971 की चुनावी जीत युद्ध से लगभग नौ महीने पहले हो चुकी थी।

बांग्लादेश युद्ध में भारत की सफलता का प्रभाव चुनाव के बाद की राजनीतिक परिस्थितियों पर पड़ा।

9. पहले पाँच लोकसभा चुनावों की तुलना

चुनाव वर्षकुल सीटेंकांग्रेस की सीटेंकांग्रेस वोट शेयर
1951–5248936444.99%
195749437147.78%
196249436144.72%
196752028340.78%
197151835243.68%

1971 में कांग्रेस ने 1967 की तुलना में 69 अधिक सीटें जीतीं। हालाँकि 1967 और 1971 के बीच पार्टी विभाजन हो चुका था, इसलिए दोनों चुनावों के कांग्रेस आँकड़ों की तुलना करते समय यह अंतर ध्यान में रखना चाहिए।

विपक्षी दलों की स्थिति में बदलाव

राजनीतिक दल19671971
भारतीय जनसंघ3522
स्वतंत्र पार्टी448
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी2323
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी1925
डीएमके2523
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी233
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी132
कांग्रेस (संगठन)अलग दल नहीं था16

10. पाँचवें लोकसभा चुनाव का ऐतिहासिक महत्व

1971 के चुनाव ने स्वतंत्र भारत की राजनीति में कई दूरगामी बदलाव स्थापित किए।

पहला, 1969 में विभाजित कांग्रेस के इंदिरा गांधी गुट को लोकसभा में अपने दम पर स्पष्ट बहुमत मिला। इससे सरकार की संसदीय स्थिति मजबूत हुई।

दूसरा, 1967 के चुनाव में महत्वपूर्ण सफलता हासिल करने वाले अनेक विपक्षी दलों को नुकसान हुआ। विशेष रूप से स्वतंत्र पार्टी 44 से आठ सीटों पर और संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी 23 से तीन सीटों पर आ गई।

तीसरा, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और तेलंगाना क्षेत्र के परिणामों ने दिखाया कि राष्ट्रीय राजनीति में क्षेत्रीय और वामपंथी दलों का अलग राजनीतिक आधार कायम था।

चौथा, मार्च 1971 में मिली संसदीय विजय के बाद सरकार के कार्यकाल में बांग्लादेश का निर्माण, भारत-पाकिस्तान युद्ध, 1975 में आपातकाल और 1977 में सत्ता परिवर्तन जैसी ऐतिहासिक घटनाएँ हुईं।

इस चुनाव का केंद्रीय निष्कर्ष: 1967 में कांग्रेस को मिली राजनीतिक चुनौती के बाद 1971 में इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी के लिए नया संसदीय बहुमत हासिल किया। लेकिन उसी पाँचवीं लोकसभा के कार्यकाल में भारत ने आपातकाल और लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़े गंभीर संवैधानिक प्रश्नों का भी सामना किया।

11. मूल आधिकारिक दस्तावेज

भारत निर्वाचन आयोग — 1971 लोकसभा चुनाव की सांख्यिकीय रिपोर्ट

निर्वाचन आयोग — Fifth General Elections in India (1971–72)

1971 के चुनाव के विस्तृत शोध के लिए निर्वाचन आयोग की सांख्यिकीय रिपोर्ट के पृष्ठ 1–5 (दल, सीटें और मतदान), 63–75 (विजयी उम्मीदवार), 76–87 (दलवार सीटें और मत प्रतिशत) तथा 98–106 (राज्यवार पार्टियों के मत) विशेष उपयोगी हैं।

इसके बाद 1977 में छठा लोकसभा चुनाव हुआ। पाँचवीं लोकसभा का कार्यकाल आपातकाल के दौरान संवैधानिक संशोधन और अवधि-विस्तार के कारण सामान्य पाँच वर्ष से अधिक चला। 1977 में पहली बार केंद्र से कांग्रेस की सत्ता समाप्त हुई और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी।

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स्रोत

निर्वाचन आयोग की सांख्यिकीय रिपोर्टें · संकलन और तालिका-सुधार की टिप्पणी