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OCN Research Desk · भारतीय संसदीय लोकतंत्र

भारत का तीसरा लोकसभा चुनाव 1962 : विस्तृत चुनावी इतिहास

राज्यवार सीटें, दलवार नतीजे और मत प्रतिशत, प्रमुख नेता तथा चुनावी घटनाक्रम

ओमकार चौधरी / OCN Research Deskस्वतंत्र शोध अध्याय · 27 अक्टूबर 2026
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भारत में तीसरे लोकसभा आम चुनाव 19 से 25 फरवरी 1962 के बीच हुए। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस ने लगातार तीसरी बार केंद्र में सरकार बनाई। हालांकि कांग्रेस की सीटें और वोट प्रतिशत दोनों 1957 के मुकाबले घटे, लेकिन उसका संसदीय बहुमत बरकरार रहा।

यह चुनाव भारतीय राजनीति में कई कारणों से ऐतिहासिक था। सी. राजगोपालाचारी की स्वतंत्र पार्टी पहली बार लोकसभा चुनाव मैदान में उतरी। भारतीय जनसंघ ने अपनी सीटों की संख्या चार से बढ़ाकर चौदह कर ली। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) ने पहली बार सात लोकसभा सीटें जीतीं और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी रही।

यह नेहरू के जीवन का अंतिम लोकसभा आम चुनाव भी था। उनका निधन 27 मई 1964 को हुआ।

निर्वाचित लोकसभा सीटें
494
कांग्रेस की जीत
361
कांग्रेस का वोट शेयर
44.72%
मतदान प्रतिशत
55.42%

1. तीसरे लोकसभा चुनाव के महत्वपूर्ण आँकड़े

विषयविवरण
चुनाव की तारीखें19–25 फरवरी 1962
निर्वाचित सीटें494
बहुमत का आँकड़ा248 निर्वाचित सीटें
पंजीकृत मतदाता21,63,61,569
मतदान करने वाले11,99,04,284
मतदान प्रतिशत55.42%
कुल उम्मीदवार1,985
राजनीतिक दल27 (निर्दलीय अलग)
कांग्रेस की सीटें361
सबसे बड़ी विपक्षी पार्टीभारतीय कम्युनिस्ट पार्टी — 29 सीटें
प्रधानमंत्रीजवाहरलाल नेहरू
मुख्य निर्वाचन आयुक्तके. वी. के. सुंदरम

निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार 385 सामान्य, 79 अनुसूचित जाति और 30 अनुसूचित जनजाति के आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र थे। इस चुनाव में सभी 494 निर्वाचन क्षेत्रों से एक-एक सांसद चुना गया। पहले दो आम चुनावों की बहुसदस्यीय निर्वाचन क्षेत्र व्यवस्था समाप्त हो चुकी थी।

2. राज्यवार लोकसभा सीटें और कांग्रेस का प्रदर्शन

1962 तक भारत के राजनीतिक मानचित्र में दो और महत्वपूर्ण परिवर्तन हो चुके थे। 1 मई 1960 को बंबई राज्य का विभाजन करके महाराष्ट्र और गुजरात बनाए गए थे।

इसीलिए 1957 की तरह संयुक्त बंबई राज्य की 66 सीटें दिखाने के बजाय अब महाराष्ट्र और गुजरात की सीटों को अलग-अलग समझना होगा।

राज्य / केंद्रशासित प्रदेशकुल सीटेंकांग्रेसअन्य दल एवं निर्दलीय
उत्तर प्रदेश866224
बिहार533914
महाराष्ट्र44413
आंध्र प्रदेश43349
मद्रास413110
मध्य प्रदेश362412
पश्चिम बंगाल362214
मैसूर (अब कर्नाटक)26251
गुजरात22166
पंजाब22148
राजस्थान22148
उड़ीसा20146
केरल18612
असम1293
दिल्ली550
हिमाचल प्रदेश440
मणिपुर211
त्रिपुरा202
कुल494361133

आधार: भारत निर्वाचन आयोग, Statistical Report on General Elections, 1962, खंड 1, पृष्ठ 60–62।

कांग्रेस ने महाराष्ट्र की 44 में से 41, मैसूर की 26 में से 25 और उत्तर प्रदेश की 86 में से 62 सीटें जीतीं। इसके विपरीत केरल में उसे केवल छह सीटें मिलीं और त्रिपुरा की दोनों सीटों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी विजयी रही।

3. कौन-कौन से राजनीतिक दल चुनाव मैदान में थे? उनके नेता कौन थे?

तीसरे चुनाव में छह राष्ट्रीय दल, 11 अन्य मान्यता प्राप्त दल तथा दस पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त दल मैदान में थे। इनके अतिरिक्त निर्दलीय उम्मीदवार भी थे।

प्रमुख दलों का नेतृत्व और उनकी राजनीतिक पहचान इस प्रकार थी।

राजनीतिक दलप्रमुख नेता
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसजवाहरलाल नेहरू, कांग्रेस अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीएस. ए. डांगे, अजय घोष, ए. के. गोपालन
स्वतंत्र पार्टीसी. राजगोपालाचारी, मीनू मसानी, एन. जी. रंगा
भारतीय जनसंघदेबप्रसाद घोष, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी
प्रजा सोशलिस्ट पार्टीआचार्य जे. बी. कृपलानी, अशोक मेहता
सोशलिस्ट पार्टीडॉ. राममनोहर लोहिया
द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके)सी. एन. अन्नादुरई, एम. करुणानिधि
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडियादादासाहेब गायकवाड़, बी. सी. कांबले
शिरोमणि अकाली दलमास्टर तारा सिंह, संत फतेह सिंह
गणतंत्र परिषदराजेंद्र नारायण सिंह देव
झारखंड पार्टीजयपाल सिंह मुंडा
अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लॉकहेमंत कुमार बसु
राम राज्य परिषदस्वामी करपात्री महाराज
हिंदू महासभाएन. सी. चटर्जी सहित वरिष्ठ नेतृत्व
रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टीत्रिदीब चौधरी
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीगकेरल का तत्कालीन मुस्लिम लीग नेतृत्व

सभी नाम चुनाव के समय संबंधित दलों के औपचारिक अध्यक्ष नहीं थे। इनमें पार्टी संस्थापक, वैचारिक नेता और प्रमुख प्रचारक भी शामिल हैं। विशेष रूप से जनसंघ में दीनदयाल उपाध्याय महत्वपूर्ण संगठनात्मक नेता थे, जबकि 1962 के लिए देबप्रसाद घोष को अध्यक्ष के रूप में दर्ज किया गया है।

4. किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं और कितना वोट प्रतिशत?

यह तीसरे लोकसभा चुनाव की सबसे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय परिणाम तालिका है। निर्वाचन आयोग के मूल दस्तावेज में दर्ज मत प्रतिशत को आधार बनाया गया है।

पार्टीसीटेंराष्ट्रीय वोट शेयर
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस36144.72%
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी299.94%
स्वतंत्र पार्टी187.89%
भारतीय जनसंघ146.44%
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी126.81%
डीएमके72.01%
सोशलिस्ट पार्टी62.69%
गणतंत्र परिषद40.30%
शिरोमणि अकाली दल30.72%
झारखंड पार्टी30.41%
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया32.83%
फॉरवर्ड ब्लॉक20.72%
राम राज्य परिषद20.60%
रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी20.39%
मुस्लिम लीग20.36%
लोक सेवक संघ20.24%
हिंदू महासभा10.65%
नूतन महागुजरात जनता परिषद10.17%
हरियाणा लोक समिति10.10%
हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस10.08%
निर्दलीय2011.05%
कुल निर्वाचित494

अन्य चुनाव लड़ने वाले दलों, जिनमें पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी, गोरखा लीग तथा तमिल नेशनल पार्टी शामिल थीं, को सीटें नहीं मिलीं। उनके मत ऊपर की सीट-विजेता तालिका में नहीं जोड़े गए हैं, इसलिए वोट प्रतिशत कॉलम का कुल 100 नहीं होगा।

परिणामों से क्या स्पष्ट होता है?

कांग्रेस को 44.72 प्रतिशत मत मिले, लेकिन उसने 73.1 प्रतिशत से अधिक निर्वाचित लोकसभा सीटें जीत लीं। उसे राष्ट्रीय स्तर पर अन्य किसी एक दल से कहीं अधिक वोट प्राप्त हुए।

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को लगभग दस प्रतिशत वोट पर 29 सीटें मिलीं। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी को करीब 6.81 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन केवल 12 सीटें मिलीं।

स्वतंत्र पार्टी को अपने पहले चुनाव में 18 सीटें मिलीं, जबकि भारतीय जनसंघ ने पिछले चुनाव की तुलना में दस अतिरिक्त सीटें जीत लीं।

5. राज्यवार प्रमुख विपक्षी दलों का प्रदर्शन

अब देखते हैं कि किन राज्यों में किस राजनीतिक दल ने कांग्रेस को चुनौती दी।

राज्यप्रमुख दलों को मिली सीटें
उत्तर प्रदेशकांग्रेस 62, जनसंघ 7, निर्दलीय 5, स्वतंत्र पार्टी 3, रिपब्लिकन पार्टी 3, कम्युनिस्ट 2, प्रजा सोशलिस्ट 2, सोशलिस्ट 1, हिंदू महासभा 1
बिहारकांग्रेस 39, स्वतंत्र पार्टी 7, झारखंड पार्टी 3, प्रजा सोशलिस्ट 2, कम्युनिस्ट 1, सोशलिस्ट 1
महाराष्ट्रकांग्रेस 41, निर्दलीय 2, प्रजा सोशलिस्ट 1
आंध्र प्रदेशकांग्रेस 34, कम्युनिस्ट 7, स्वतंत्र पार्टी 1, निर्दलीय 1
मद्रासकांग्रेस 31, डीएमके 7, कम्युनिस्ट 2, फॉरवर्ड ब्लॉक 1
मध्य प्रदेशकांग्रेस 24, निर्दलीय 4, जनसंघ 3, प्रजा सोशलिस्ट 3, सोशलिस्ट 1, राम राज्य परिषद 1
पश्चिम बंगालकांग्रेस 22, कम्युनिस्ट 9, निर्दलीय 2, फॉरवर्ड ब्लॉक 1, आरएसपी 1, लोक सेवक संघ 1
गुजरातकांग्रेस 16, स्वतंत्र पार्टी 4, प्रजा सोशलिस्ट 1, नूतन महागुजरात जनता परिषद 1
पंजाबकांग्रेस 14, जनसंघ 3, अकाली दल 3, सोशलिस्ट 1, हरियाणा लोक समिति 1
राजस्थानकांग्रेस 14, स्वतंत्र पार्टी 3, निर्दलीय 3, जनसंघ 1, राम राज्य परिषद 1
उड़ीसाकांग्रेस 14, गणतंत्र परिषद 4, प्रजा सोशलिस्ट 1, सोशलिस्ट 1
केरलकांग्रेस 6, कम्युनिस्ट 6, निर्दलीय 3, मुस्लिम लीग 2, आरएसपी 1
असमकांग्रेस 9, प्रजा सोशलिस्ट 2, हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस 1
मैसूरकांग्रेस 25, लोक सेवक संघ 1
दिल्लीकांग्रेस 5
हिमाचल प्रदेशकांग्रेस 4
मणिपुरकांग्रेस 1, सोशलिस्ट 1
त्रिपुराकम्युनिस्ट पार्टी 2

निर्वाचन आयोग, तीसरी लोकसभा चुनाव सांख्यिकीय रिपोर्ट, पृष्ठ 60–62।

6. तीसरे आम चुनाव की छह महत्वपूर्ण राजनीतिक घटनाएँ

पहली बार स्वतंत्र पार्टी की महत्वपूर्ण सफलता

कांग्रेस के पूर्व वरिष्ठ नेता और स्वतंत्र भारत के अंतिम गवर्नर जनरल सी. राजगोपालाचारी ने 1959 में स्वतंत्र पार्टी की स्थापना की थी। इस पार्टी ने नेहरू सरकार की समाजवादी आर्थिक नीतियों, सरकारी नियंत्रण और लाइसेंस व्यवस्था का विरोध किया।

1962 में 18 सीटें जीतकर यह लोकसभा की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी। बिहार में सात, गुजरात में चार, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में तीन-तीन तथा आंध्र प्रदेश में एक सीट हासिल हुई।

भारतीय जनसंघ का विस्तार

1957 में जनसंघ के केवल चार सांसद थे। 1962 में यह संख्या बढ़कर 14 हो गई। उत्तर प्रदेश में सात, मध्य प्रदेश में तीन, पंजाब में तीन और राजस्थान में एक सीट मिली।

जनसंघ ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी संगठनात्मक उपस्थिति बढ़ाई। दीनदयाल उपाध्याय संगठन के प्रमुख रणनीतिकार थे।

डीएमके का लोकसभा में प्रवेश

सी. एन. अन्नादुरई के नेतृत्व वाली डीएमके ने मद्रास राज्य की सात लोकसभा सीटें जीतीं। यह दक्षिण भारत की क्षेत्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण पड़ाव था।

इसके पाँच वर्ष बाद 1967 के विधानसभा चुनाव में डीएमके ने मद्रास राज्य में कांग्रेस का शासन समाप्त कर दिया।

अटल बिहारी वाजपेयी की चुनावी पराजय

वाजपेयी 1957 में बलरामपुर से लोकसभा सदस्य बने थे। लेकिन 1962 में उन्हें बलरामपुर सीट से कांग्रेस की सुभद्रा जोशी ने पराजित किया। बाद में वे फिर लोकसभा पहुँचे।

कांग्रेस के भीतर नेतृत्व परिवर्तन का दौर: नेहरू तीसरी बार निर्वाचित प्रधानमंत्री बने, लेकिन 1962–64 के बीच भारत-चीन युद्ध, कांग्रेस के संगठनात्मक बदलाव और नेहरू की मृत्यु के कारण देश की राजनीति में बड़े परिवर्तन हुए।

चीन से युद्ध चुनाव के बाद हुआ: 1962 के लोकसभा चुनाव फरवरी में संपन्न हुए थे, जबकि भारत-चीन युद्ध अक्टूबर–नवंबर 1962 में हुआ। इसलिए युद्ध के परिणाम को फरवरी में हुए चुनाव का कारण बताना ऐतिहासिक रूप से गलत होगा। हालांकि इसके राजनीतिक प्रभाव आगे के वर्षों में दिखाई दिए।

7. पहले तीन लोकसभा चुनावों का तुलनात्मक अध्ययन

विवरण1951–5219571962
लोकसभा सीटें489494494
कांग्रेस सीटें364371361
कांग्रेस वोट शेयर44.99%47.78%44.72%
कम्युनिस्ट पार्टी सीटें162729
कम्युनिस्ट वोट शेयर3.29%8.92%9.94%
जनसंघ सीटें3414
जनसंघ वोट शेयर3.06%5.97%6.44%
निर्दलीय सांसद374220
प्रधानमंत्रीनेहरूनेहरूनेहरू

इस तुलना से तीन प्रमुख तथ्य सामने आते हैं। कांग्रेस ने पहले तीनों आम चुनावों में निर्विवाद संसदीय बहुमत हासिल किया। दूसरी तरफ कम्युनिस्ट पार्टी और जनसंघ दोनों की सीटों में लगातार वृद्धि हुई। तीसरा, 1962 में स्वतंत्र पार्टी और डीएमके जैसे दलों का उभार आगे की बहुदलीय राजनीति के लिए महत्वपूर्ण साबित हुआ।

8. मूल प्रामाणिक स्रोत

इस विवरण का मुख्य स्रोत भारत निर्वाचन आयोग की 1962 की आधिकारिक सांख्यिकीय रिपोर्ट है।

निर्वाचन आयोग : सभी लोकसभा चुनावों की मूल सांख्यिकीय रिपोर्ट

इस अध्ययन में विशेष रूप से रिपोर्ट के पृष्ठ 2 (निर्वाचन क्षेत्र), पृष्ठ 4 (मतदान), पृष्ठ 57–62 (दलवार और राज्यवार सीटें) तथा पृष्ठ 63–64 (राष्ट्रीय वोट शेयर) उपयोगी हैं।

ऐतिहासिक निष्कर्ष

1962 के तीसरे लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की तीसरी लगातार विजय के बावजूद राष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप बदलना शुरू हो गया था। एक ओर वामपंथी दल मजबूत हो रहे थे, दूसरी ओर स्वतंत्र पार्टी और जनसंघ जैसे दलों ने अलग आर्थिक तथा राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर चुनावी जमीन तैयार की। दक्षिण में डीएमके ने क्षेत्रीय राजनीति का नया अध्याय खोला।

इन सबके बीच 1967 का चौथा लोकसभा चुनाव महत्वपूर्ण राजनीतिक मोड़ बना, जब कांग्रेस की लोकसभा सीटें काफी घटीं और अनेक राज्यों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं। इसलिए भारत के चुनावी इतिहास में 1962 और 1967 के परिणामों का तुलनात्मक अध्ययन विशेष महत्व रखता है।

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स्रोत

निर्वाचन आयोग की सांख्यिकीय रिपोर्टें · संकलन और तालिका-सुधार की टिप्पणी