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OCN Research Desk · भारतीय संसदीय लोकतंत्र

भारत का चौथा लोकसभा चुनाव 1967 : कांग्रेस के एकछत्र प्रभुत्व को पहली बड़ी चुनौती

राज्यवार सीटें, दलवार नतीजे और मत प्रतिशत, प्रमुख नेता तथा चुनावी घटनाक्रम

ओमकार चौधरी / OCN Research Deskस्वतंत्र शोध अध्याय · 27 अक्टूबर 2026
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17 से 21 फरवरी 1967 के बीच हुए चौथे लोकसभा आम चुनाव ने स्वतंत्र भारत की राजनीति की दिशा बदल दी। पहली बार कांग्रेस की लोकसभा सीटें 300 से नीचे आ गईं। इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने 520 में से 283 सीटें जीतकर लगातार चौथी बार केंद्र में सरकार बनाई, लेकिन उसकी सीटों की संख्या 1962 के मुकाबले 78 घट गई।

इस चुनाव का दूसरा महत्वपूर्ण परिणाम था गैर-कांग्रेसी दलों का उभार। स्वतंत्र पार्टी, भारतीय जनसंघ, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी, कम्युनिस्ट पार्टियों और डीएमके ने राष्ट्रीय तथा क्षेत्रीय राजनीति में अपनी स्थिति मजबूत की। मद्रास राज्य में कांग्रेस को लोकसभा की केवल तीन सीटें मिलीं, जबकि डीएमके ने 25 सीटें जीत लीं।

साथ हुए विधानसभा चुनावों और उसके बाद बने गठबंधनों ने उत्तर भारत सहित अनेक राज्यों में कांग्रेस के लंबे शासन को चुनौती दी। इसी दौर में संयुक्त विधायक दल की सरकारों और दल-बदल की राजनीति को व्यापक पहचान मिली।

निर्वाचित लोकसभा सीटें
520
कांग्रेस की सीटें
283
कांग्रेस का वोट शेयर
40.78%
मतदान प्रतिशत
61.04%

1. चौथे लोकसभा चुनाव के प्रमुख तथ्य

विषयविवरण
मतदान की मुख्य तारीखें17–21 फरवरी 1967
चुनाव आयोगमुख्य निर्वाचन आयुक्त के. वी. के. सुंदरम
निर्वाचित लोकसभा सीटें520
बहुमत के लिए आवश्यक सीटें261
कुल उम्मीदवार2,369
पंजीकृत मतदातालगभग 25.02 करोड़
मतदान प्रतिशत61.04%
कांग्रेस की सीटें283
कांग्रेस का वोट शेयर40.78%
सबसे बड़ा विपक्षी दलस्वतंत्र पार्टी — 44 सीटें
प्रधानमंत्रीइंदिरा गांधी
पहली बैठक, चौथी लोकसभा16 मार्च 1967

कुल मतदान प्रतिशत और डाले गए वैध मतों के प्रतिशत की गणना अलग होती है। इसी वजह से कुछ ऐतिहासिक संकलनों में मतदान के अलग आँकड़े दिखाई देते हैं।

2. तत्कालीन राज्यों में कितनी लोकसभा सीटें थीं और कांग्रेस कितनी जीती?

1962 के बाद एक बड़ा परिवर्तन 1 नवंबर 1966 को पंजाब के पुनर्गठन से हुआ। हरियाणा नया राज्य बना, जबकि चंडीगढ़ केंद्रशासित प्रदेश बना। 1967 के चुनाव में जम्मू-कश्मीर की छह लोकसभा सीटों पर भी प्रत्यक्ष चुनाव हुए।

नीचे निर्वाचन आयोग की 1967 की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार राज्यवार स्थिति दी गई है।

राज्य / केंद्रशासित प्रदेशकुल सीटेंकांग्रेसअन्य
उत्तर प्रदेश854738
बिहार533419
महाराष्ट्र45378
आंध्र प्रदेश41356
पश्चिम बंगाल401426
मद्रास39336
मध्य प्रदेश372413
मैसूर (कर्नाटक)27189
गुजरात241113
राजस्थान231013
असम14104
पंजाब1394
उड़ीसा20614
केरल19118
हरियाणा972
जम्मू-कश्मीर651
दिल्ली716
हिमाचल प्रदेश660
त्रिपुरा220
मणिपुर202
गोवा, दमन और दीव202
नगालैंड101
अंडमान-निकोबार110
चंडीगढ़101
दादरा और नगर हवेली110
लक्षद्वीप101
पांडिचेरी (पुडुचेरी)110
कुल520283237

स्रोत: निर्वाचन आयोग, Statistical Report on General Elections, 1967, Fourth Lok Sabha, खंड I, राज्यवार विजेता दल तालिका, पृष्ठ 80–83।

राज्यों के परिणामों में चार बड़े उलटफेर

  • मद्रास में कांग्रेस 39 में से केवल तीन सीटें जीत पाई; डीएमके 25 सीटों पर विजयी रही।
  • केरल में कांग्रेस सिर्फ एक सीट जीती; मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने नौ सीटें हासिल कीं।
  • पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को 40 में से 14 सीटें मिलीं।
  • उड़ीसा में कांग्रेस को 20 में से छह सीटें मिलीं, जबकि स्वतंत्र पार्टी ने आठ सीटें जीतीं।

3. राजनीतिक दल, उनके नेता और चुनाव परिणाम

1967 में कांग्रेस के सामने कई अलग-अलग विचारधाराओं वाले दल थे। कांग्रेस के मुकाबले जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी, समाजवादी और कम्युनिस्ट दलों का प्रभाव बढ़ा। 1964 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विभाजन से बनी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने भी पहली बार आम चुनाव लड़ा।

प्रमुख दल और तत्कालीन नेतृत्व

राजनीतिक दलप्रमुख नेता
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेसइंदिरा गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज
स्वतंत्र पार्टीसी. राजगोपालाचारी, मीनू मसानी, एन. जी. रंगा
भारतीय जनसंघदीनदयाल उपाध्याय, बलराज मधोक, अटल बिहारी वाजपेयी
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टीएस. ए. डांगे, भूपेश गुप्ता
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टीपी. सुंदरैया, ई. एम. एस. नंबूदरीपाद, ए. के. गोपालन
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टीडॉ. राममनोहर लोहिया, जॉर्ज फर्नांडिस, राजनारायण
प्रजा सोशलिस्ट पार्टीअशोक मेहता से जुड़ी समाजवादी धारा, समर गुहा सहित अन्य नेता
द्रविड़ मुनेत्र कड़गमसी. एन. अन्नादुरई, एम. करुणानिधि
बंगला कांग्रेसअजय कुमार मुखर्जी
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडियादादासाहेब गायकवाड़ सहित दलित आंदोलन के नेता
अकाली दल (संत समूह)संत फतेह सिंह
अकाली दल (मास्टर समूह)मास्टर तारा सिंह
ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉकहेमंत कुमार बसु सहित नेतृत्व
पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टीमहाराष्ट्र का किसान-मजदूर नेतृत्व
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीगकेरल का तत्कालीन मुस्लिम लीग नेतृत्व

ध्यान रहे कि यह संबंधित दलों के प्रमुख राजनीतिक चेहरों की सूची है। इनमें से हर व्यक्ति चुनाव के समय औपचारिक पार्टी अध्यक्ष नहीं था।

4. पार्टीवार सीटें और राष्ट्रीय वोट शेयर

निर्वाचन आयोग के मूल आँकड़ों के अनुसार परिणाम इस प्रकार थे।

राजनीतिक दलजीती सीटेंवोट शेयर
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस28340.78%
स्वतंत्र पार्टी448.67%
भारतीय जनसंघ359.31%
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी235.11%
संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी234.92%
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी194.28%
प्रजा सोशलिस्ट पार्टी133.06%
डीएमके253.79%
बंगला कांग्रेस50.83%
अकाली दल (संत समूह)30.66%
पीजेंट्स एंड वर्कर्स पार्टी20.71%
फॉरवर्ड ब्लॉक20.43%
इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग20.28%
रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया12.47%
ऑल पार्टी हिल लीडर्स कॉन्फ्रेंस10.08%
जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस10.14%
झारखंड दल10.13%
नगालैंड नेशनलिस्ट ऑर्गेनाइजेशन10.00%\*
यूनाइटेड गोअन्स (सेक्वेरा समूह)10.07%
यूनाइटेड गोअन्स से संबंधित अन्य समूह0लगभग 0.00%
निर्दलीय उम्मीदवार3513.78%

\*निर्वाचन आयोग की दलवार तालिका में नगालैंड नेशनलिस्ट ऑर्गेनाइजेशन के निर्विरोध निर्वाचित उम्मीदवार के कारण दर्ज मत शून्य हैं। शून्य वोट शेयर का अर्थ चुनावी समर्थन का अभाव नहीं है। इस तालिका में अन्य शून्य-सीट वाले छोटे दलों को अलग-अलग नहीं दिखाया गया है।

एक विशेष बात

जनसंघ को 9.31 प्रतिशत मत मिले, जबकि स्वतंत्र पार्टी को 8.67 प्रतिशत। इसके बावजूद स्वतंत्र पार्टी ने 44 और जनसंघ ने 35 सीटें जीतीं।

इसी प्रकार केवल 3.79 प्रतिशत राष्ट्रीय मत प्राप्त करने वाली डीएमके 25 सीटें जीत गई, क्योंकि उसका जनाधार मुख्यतः मद्रास राज्य में केंद्रित था।

5. प्रमुख राज्यों में विपक्ष का प्रदर्शन

राज्यविपक्ष और क्षेत्रीय दलों की सीटें
उत्तर प्रदेशजनसंघ 12, संयुक्त सोशलिस्ट 8, भाकपा 5, प्रजा सोशलिस्ट 2, निर्दलीय 8 सहित अन्य
बिहारसंयुक्त सोशलिस्ट 7, भाकपा 5, निर्दलीय 4, जनसंघ 1, प्रजा सोशलिस्ट 1, झारखंड दल 1
मध्य प्रदेशजनसंघ 10, निर्दलीय 2, स्वतंत्र पार्टी 1
पश्चिम बंगालभाकपा 5, माकपा 5, बंगला कांग्रेस 5, निर्दलीय 7, फॉरवर्ड ब्लॉक 2 सहित अन्य
मद्रासडीएमके 25, स्वतंत्र पार्टी 6, माकपा 4, निर्दलीय 1
गुजरातस्वतंत्र पार्टी 12, निर्दलीय 1
राजस्थानस्वतंत्र पार्टी 8, जनसंघ 3, निर्दलीय 2
उड़ीसास्वतंत्र पार्टी 8, प्रजा सोशलिस्ट 4, संयुक्त सोशलिस्ट 1, निर्दलीय 1
केरलमाकपा 9, भाकपा 3, संयुक्त सोशलिस्ट 3, मुस्लिम लीग 2, निर्दलीय 1
दिल्लीजनसंघ 6, कांग्रेस 1

6. चुनाव के सबसे चर्चित नेता और उनके परिणाम

इंदिरा गांधी — रायबरेली से विजय

इंदिरा गांधी ने उत्तर प्रदेश की रायबरेली सीट से चुनाव जीता। वे 1966 में लालबहादुर शास्त्री के निधन के बाद प्रधानमंत्री बनी थीं। 1967 उनका प्रधानमंत्री के रूप में पहला आम चुनाव था।

अटल बिहारी वाजपेयी — बलरामपुर से जीत

1962 में बलरामपुर से पराजय के बाद वाजपेयी ने 1967 में यही सीट फिर जीत ली। इस चुनाव में जनसंघ की सीटें 14 से बढ़कर 35 हो गईं।

डॉ. राममनोहर लोहिया — कन्नौज से जीत

लोहिया संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेताओं में थे। कांग्रेस विरोधी दलों की व्यापक राजनीतिक एकजुटता में उनका महत्वपूर्ण योगदान था। उनका निधन इसी वर्ष 12 अक्टूबर 1967 को हुआ।

जॉर्ज फर्नांडिस — एस. के. पाटिल को पराजित किया

बंबई दक्षिण लोकसभा सीट पर जॉर्ज फर्नांडिस ने कांग्रेस के शक्तिशाली नेता एस. के. पाटिल को हराया। इस विजय से फर्नांडिस राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुए।

इसके अलावा विजयलक्ष्मी पंडित फूलपुर से, राजमाता विजयाराजे सिंधिया गुना से और गुलजारीलाल नंदा कैथल से निर्वाचित हुए।

7. कांग्रेस को किन बड़े नेताओं की हार से झटका लगा?

1967 में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं को पराजय मिली। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष के. कामराज, केंद्रीय मंत्री एस. के. पाटिल, अतुल्य घोष और बिहार के नेता के. बी. सहाय शामिल थे।

कांग्रेस संगठन के शक्तिशाली नेताओं का प्रभाव कम हुआ और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तथा पार्टी के वरिष्ठ संगठनात्मक नेतृत्व के बीच आगे चलकर मतभेद गहरे हुए। यही टकराव 1969 में कांग्रेस विभाजन की पृष्ठभूमि बना।

8. नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर : 1967 का राजनीतिक परिवर्तन

यह ध्यान देने योग्य है कि नीचे विधानसभा चुनावों और उसके बाद हुए सरकार गठन की चर्चा है, लोकसभा सीटों की नहीं।

1967 में नौ राज्यों में कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। सात राज्यों में उसका बहुमत समाप्त हुआ और दो अन्य राज्यों में दल-बदल के कारण वह सरकार नहीं बना सकी या सरकार से बाहर हो गई।

राज्यगैर-कांग्रेसी सरकार से जुड़ा प्रमुख नेता
उत्तर प्रदेशचौधरी चरण सिंह
बिहारमहामाया प्रसाद सिन्हा
मध्य प्रदेशगोविंद नारायण सिंह
हरियाणाराव बीरेंद्र सिंह
पंजाबगुरनाम सिंह
पश्चिम बंगालअजय कुमार मुखर्जी
उड़ीसाराजेंद्र नारायण सिंह देव
मद्राससी. एन. अन्नादुरई
केरलई. एम. एस. नंबूदरीपाद

संयुक्त विधायक दल की राजनीति

उत्तर प्रदेश में 425 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस 199 सीटों पर सिमट गई। चौधरी चरण सिंह कांग्रेस से अलग हुए और अप्रैल 1967 में विभिन्न दलों के समर्थन से मुख्यमंत्री बने।

इस सरकार को जनसंघ, समाजवादी दलों, कम्युनिस्ट धारा के दलों, स्वतंत्र पार्टी तथा निर्दलीय विधायकों का समर्थन मिला। अलग-अलग विचारधाराओं वाले दलों का कांग्रेस-विरोध के आधार पर एकजुट होना इस दौर की प्रमुख राजनीतिक विशेषता थी।

9. 1967 के चुनाव से पहले देश की परिस्थितियाँ

1962 से 1967 के बीच भारत ने कई बड़ी घटनाओं का सामना किया था।

  • अक्टूबर–नवंबर 1962 में भारत-चीन युद्ध हुआ।
  • मई 1964 में जवाहरलाल नेहरू का निधन हुआ।
  • लालबहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने।
  • 1965 में भारत-पाकिस्तान युद्ध हुआ।
  • जनवरी 1966 में ताशकंद समझौते के बाद शास्त्री का निधन हुआ।
  • इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं।
  • देश को खाद्यान्न संकट, सूखे, महँगाई और आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
  • जून 1966 में रुपये का अवमूल्यन किया गया।

इन परिस्थितियों ने चुनाव की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार की। सामाजिक असंतोष, आर्थिक कठिनाइयों और विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय मांगों का असर भी चुनावी राजनीति में दिखाई दिया।

10. पहले चार लोकसभा चुनावों की तुलना

विवरण1951–52195719621967
निर्वाचित सीटें489494494520
कांग्रेस की सीटें364371361283
कांग्रेस वोट शेयर44.99%47.78%44.72%40.78%
जनसंघ की सीटें341435
जनसंघ वोट शेयर3.06%5.97%6.44%9.31%
कम्युनिस्ट पार्टी की सीटें (भाकपा)16272923
स्वतंत्र पार्टी की सीटें——1844

1962 से 1967 के बीच कांग्रेस की 78 सीटें कम हुईं, जबकि लोकसभा की निर्वाचित सीटें 494 से बढ़कर 520 हो चुकी थीं।

11. 1967 के चुनाव का ऐतिहासिक महत्व

1967 भारतीय लोकतंत्र के विकास में एक निर्णायक वर्ष था। इस चुनाव ने यह स्थापित कर दिया कि कांग्रेस के लंबे शासन के बावजूद उसके सामने कई राज्यों में प्रभावशाली राजनीतिक विकल्प उभर चुके थे।

स्वतंत्र पार्टी 44 सीटों के साथ सबसे बड़ा विपक्षी दल बनी। जनसंघ की सीटें बढ़कर 35 पहुँचीं। वामपंथी राजनीति दो अलग कम्युनिस्ट दलों के माध्यम से आगे बढ़ी। डीएमके ने मद्रास में कांग्रेस के प्रभुत्व को समाप्त किया। उत्तर भारत में संयुक्त विधायक दल की सरकारों ने गठबंधन आधारित सत्ता-संचालन का प्रयोग शुरू किया।

इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक परिणाम यह था कि कांग्रेस केंद्र में अपना बहुमत बचाने में सफल रही, लेकिन राज्यों में उसका एकछत्र प्रभुत्व समाप्त होने लगा। यही परिस्थितियाँ 1969 के कांग्रेस विभाजन और 1971 के मध्यावधि लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि बनीं।

आधिकारिक मूल स्रोत: निर्वाचन आयोग : चौथा लोकसभा आम चुनाव 1967, संपूर्ण सांख्यिकीय रिपोर्ट (खंड I)।

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स्रोत

निर्वाचन आयोग की सांख्यिकीय रिपोर्टें · संकलन और तालिका-सुधार की टिप्पणी