छगन भुजबल का विद्रोह
दिसंबर 1991 में छगन भुजबल शिवसेना से अलग हुए। इसे बालासाहेब ठाकरे के नेतृत्व के सामने पहला बड़ा विधायी विद्रोह माना जाता है।
यह शोध परियोजना शिवसेना के भीतर हुए प्रमुख विद्रोहों, नेतृत्व संघर्ष, वैचारिक बदलाव और 2022 के बाद उभरे संवैधानिक विवाद का दस्तावेज़-आधारित अध्ययन है। आज उपलब्ध सार्वजनिक संस्करण में संरचना और सत्यापित आधारभूत समयरेखा दी गई है।
मूल शोध-संकलन में अनेक संस्करण और दोहराव हैं। प्रकाशित सामग्री को आधिकारिक अभिलेखों, न्यायिक दस्तावेज़ों और विश्वसनीय समकालीन रिपोर्टों से सत्यापित करने के बाद ही पूर्ण डॉसियर में शामिल किया जाएगा।
यह प्रारंभिक समयरेखा चार निर्णायक संगठनात्मक मोड़ों को अलग-अलग संदर्भ में रखती है।
दिसंबर 1991 में छगन भुजबल शिवसेना से अलग हुए। इसे बालासाहेब ठाकरे के नेतृत्व के सामने पहला बड़ा विधायी विद्रोह माना जाता है।
पूर्व मुख्यमंत्री नारायण राणे का उद्धव ठाकरे के बढ़ते संगठनात्मक प्रभाव से टकराव हुआ। जुलाई 2005 में वे शिवसेना से बाहर हुए और बाद में कांग्रेस में शामिल हुए।
राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़कर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई। यह विधायी संख्या से अधिक ठाकरे परिवार और संगठन के उत्तराधिकार से जुड़ा विभाजन था।
एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में विधायकों का बड़ा समूह अलग हुआ, महाविकास अघाड़ी सरकार गिरी और फरवरी 2023 में निर्वाचन आयोग ने ‘शिवसेना’ नाम तथा ‘धनुष-बाण’ चिह्न शिंदे पक्ष को दिया।
निर्वाचन आयोग पार्टी के नाम और चिह्न के विवाद पर निर्णय देता है; विधानसभा अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता याचिकाएँ तय करते हैं; और सुप्रीम कोर्ट इन संवैधानिक कार्रवाइयों की न्यायिक समीक्षा करता है। इनके निष्कर्षों को एक-दूसरे का पर्याय नहीं माना जा सकता।
निर्वाचन आयोग ने Symbols Order, 1968 के पैरा 15 के अंतर्गत एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले समूह को आधिकारिक ‘शिवसेना’ और आरक्षित चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ का अधिकारी माना। आयोग ने उपलब्ध संगठनात्मक रिकॉर्ड को अनिर्णायक मानते हुए विधायी बहुमत के परीक्षण को निर्णायक आधार बनाया।
पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि राज्यपाल के सामने ऐसा वस्तुनिष्ठ आधार नहीं था जिससे यह निष्कर्ष निकले कि उद्धव ठाकरे सरकार सदन का विश्वास खो चुकी थी। फिर भी पूर्व स्थिति बहाल नहीं की गई, क्योंकि ठाकरे ने फ्लोर टेस्ट का सामना किए बिना इस्तीफा दे दिया था।
विधानसभा अध्यक्ष ने निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में उपलब्ध 1999 के पार्टी संविधान को प्रासंगिक माना और विधायी बहुमत के आधार पर विभाजन के समय शिंदे समूह को वास्तविक शिवसेना माना। परिणामस्वरूप शिंदे पक्ष के विधायकों को अयोग्य ठहराने की याचिकाएँ खारिज की गईं।
1966 से संगठन, मराठी अस्मिता, शाखा मॉडल और हिंदुत्व की ओर यात्रा।
बालासाहेब ठाकरे से उद्धव ठाकरे तक संगठनात्मक सत्ता का हस्तांतरण।
बंडू शिंगरे और छगन भुजबल प्रकरण की दस्तावेज़ी पड़ताल।
2005–06 के दो अलग प्रकार के संगठनात्मक संकट।
भाजपा से अलगाव, महाविकास अघाड़ी और 2022 की पृष्ठभूमि।
विधायक दल, सरकार परिवर्तन और दोनों पक्षों के दावे।
दसवीं अनुसूची, राज्यपाल, विधानसभा अध्यक्ष, निर्वाचन आयोग और सुप्रीम कोर्ट।
दोनों संगठनों के चुनावी प्रदर्शन और 2026 तक राजनीतिक पुनर्गठन।
विस्तृत अध्याय, दस्तावेज़ प्रतियाँ, स्रोत-टिप्पणियाँ, पूर्ण समयरेखा और वॉटरमार्कयुक्त PDF पंजीकृत/अनुमोदित पाठकों के लिए उपलब्ध कराई जाएगी। प्रवेश व्यवस्था अगले चरण में सक्रिय होगी।