विधानसभा अध्यक्ष का जनवरी 2024 फैसला
शिंदे समूह को वास्तविक राजनीतिक दल मानने और दोनों पक्षों के विधायकों को अयोग्य न ठहराने के कारण

10 जनवरी 2024 को महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष राहुल नार्वेकर ने शिवसेना के दोनों समूहों की 34 अयोग्यता याचिकाओं पर आदेश दिया। कुल 54 विधायकों से संबंधित याचिकाएँ खारिज हुईं और कोई विधायक अयोग्य नहीं ठहराया गया। आदेश का केंद्रीय आधार यह था कि 21 जून 2022 को प्रतिद्वंद्वी गुट उभरने के समय एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला समूह ही ‘वास्तविक शिवसेना राजनीतिक दल’ था।
अध्यक्ष को पहले कौन-सा प्रश्न तय करना था?
मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने अयोग्यता याचिकाएँ अध्यक्ष को लौटाते हुए कहा था कि वे केवल विधायक दल के बहुमत या निर्वाचन आयोग के बाद के नाम–चिह्न आदेश पर निर्भर न रहें। अध्यक्ष को विभाजन की प्रासंगिक तारीख पर पार्टी संविधान, संगठनात्मक नेतृत्व और उपलब्ध सामग्री देखकर पहचानना था कि वास्तविक ‘राजनीतिक दल’ कौन था और उसकी ओर से अधिकृत नेता तथा व्हिप कौन थे।
यह पहचान आवश्यक थी क्योंकि दोनों पक्ष एक-दूसरे पर पार्टी निर्देश तोड़ने का आरोप लगा रहे थे। यदि निर्देश जारी करने वाला व्यक्ति उस समय राजनीतिक दल का अधिकृत व्हिप ही नहीं था, तो उसके उल्लंघन पर दसवीं अनुसूची की अयोग्यता नहीं टिक सकती थी।
1999 का संविधान ही आधिकारिक रिकॉर्ड क्यों माना गया?
उद्धव पक्ष ने 2018 की संशोधित नेतृत्व-संरचना पर भरोसा किया, जिसमें ‘पक्ष प्रमुख’ के रूप में उद्धव ठाकरे के पास व्यापक अधिकार होने का दावा था। अध्यक्ष ने कहा कि 2018 का संशोधित पार्टी संविधान निर्वाचन आयोग के आधिकारिक रिकॉर्ड में विधिवत प्रस्तुत और प्रमाणित नहीं था। इसलिए उन्होंने आयोग से प्राप्त 1999 के शिवसेना संविधान को लागू दस्तावेज़ माना।
1999 के संविधान में सर्वोच्च अधिकार केवल एक व्यक्ति की इच्छा नहीं, बल्कि ‘राष्ट्रीय कार्यकारिणी’ जैसी सामूहिक संस्था से जुड़ा था। अध्यक्ष के अनुसार उद्धव ठाकरे का निर्णय अपने आप पूरे राजनीतिक दल की इच्छा का पर्याय नहीं बन सकता था। इसी व्याख्या ने उद्धव द्वारा शिंदे को नेता पद से हटाने और बाद की अनुशासनात्मक कार्रवाई के दावे को कमजोर किया।
संगठनात्मक नेतृत्व का रिकॉर्ड अस्पष्ट रहा
दोनों समूहों ने पदाधिकारियों और संगठनात्मक समर्थन की सामग्री दी, लेकिन अध्यक्ष ने ऐसी निर्विवाद सदस्य-सूची या प्रतिनिधि निकाय का प्रमाण नहीं पाया जिससे संगठनात्मक बहुमत निश्चित रूप से गिना जा सके। 2018 की नेतृत्व-संरचना को 1999 के संविधान के अनुरूप भी नहीं माना गया।
इस कारण संगठनात्मक कसौटी किसी पक्ष को निर्णायक उत्तर नहीं दे सकी। यह निर्वाचन आयोग के फरवरी 2023 आदेश से मिलता-जुलता निष्कर्ष था, हालांकि अध्यक्ष का अधिकार क्षेत्र और निर्णय की प्रासंगिक तारीख अलग थी।
विधायी बहुमत ने शिंदे पक्ष का दावा मजबूत किया
21 जून 2022 के आसपास शिंदे के समर्थन में शिवसेना विधायकों का स्पष्ट बहुमत था। पार्टी संविधान और संगठनात्मक नेतृत्व से निर्णायक उत्तर न मिलने पर अध्यक्ष ने इस विधायी समर्थन को वास्तविक राजनीतिक दल की पहचान में महत्वपूर्ण माना। परिणामस्वरूप शिंदे को विधायक दल का वैध नेता और उनके समूह को उस समय की वास्तविक शिवसेना माना गया।
अध्यक्ष का निष्कर्ष निर्वाचन आयोग के निर्णय की सीधी नकल होने का दावा नहीं करता; फिर भी दोनों संस्थाओं ने रिकॉर्ड की समान कमजोरी—2018 संविधान और सत्यापित संगठनात्मक सूची का अभाव—और शिंदे पक्ष के विधायी बहुमत को महत्व दिया।
1999 का संविधान मान्य → उद्धव का व्यक्तिगत निर्णय पार्टी की सामूहिक इच्छा नहीं → संगठनात्मक बहुमत अनिर्णायक → शिंदे पक्ष के पास विधायी बहुमत → शिंदे समूह वास्तविक राजनीतिक दल → उद्धव पक्ष का बैठक-निर्देश शिंदे विधायकों को अयोग्य करने का आधार नहीं।
शिंदे समर्थक विधायक अयोग्य क्यों नहीं हुए?
उद्धव पक्ष ने कहा कि शिंदे और उनके समर्थक संपर्क से बाहर गए, 21–22 जून की पार्टी बैठकों में नहीं आए, नेतृत्व के विरुद्ध प्रस्ताव किए और इस आचरण से स्वेच्छा से पार्टी सदस्यता छोड़ दी। अध्यक्ष ने इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया। वास्तविक राजनीतिक दल शिंदे समूह को मान लेने के बाद उद्धव पक्ष के मुख्य सचेतक सुनील प्रभु द्वारा बुलाई बैठक और जारी निर्देश को शिंदे विधायकों पर वैध पार्टी व्हिप नहीं माना गया।
अध्यक्ष ने यह भी कहा कि बैठक में अनुपस्थिति, नेतृत्व से असहमति या पार्टी के भीतर विरोध अपने आप ‘स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना’ नहीं है। दसवीं अनुसूची हर प्रकार के अनुशासनहीन व्यवहार का दंडात्मक माध्यम नहीं; इसके लिए ऐसा स्पष्ट आचरण चाहिए जिससे दल छोड़ना सिद्ध हो। उनके अनुसार प्रस्तुत सामग्री उस सीमा तक नहीं पहुँची।
उद्धव समर्थक विधायक भी अयोग्य क्यों नहीं हुए?
शिंदे पक्ष ने आरोप लगाया कि उद्धव समर्थक विधायकों ने जुलाई 2022 में विधानसभा अध्यक्ष चुनाव और विश्वास मत के दौरान भरत गोगावले के व्हिप का उल्लंघन किया। अध्यक्ष ने गोगावले की नियुक्ति को मान्य माना, लेकिन अयोग्यता के लिए केवल वैध व्हिप होना पर्याप्त नहीं था—उसका संबंधित विधायकों को समय पर और विधिवत मिलना भी सिद्ध होना आवश्यक था।
आदेश में व्हिप की तामील के प्रमाण को अपर्याप्त माना गया। भौतिक सेवा, संदेश भेजने और प्राप्ति संबंधी साक्ष्य में कमियाँ थीं। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के अनुसार किसी विधायक को ऐसे निर्देश के उल्लंघन पर अयोग्य नहीं किया जा सकता जिसकी पर्याप्त तामील प्रमाणित न हो। इस कारण शिंदे पक्ष की याचिकाएँ भी खारिज हुईं।
उद्धव पक्ष ने फैसले को क्यों चुनौती दी?
उद्धव पक्ष का तर्क है कि अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के विपरीत विधायक बहुमत को वास्तविक राजनीतिक दल पहचानने में निर्णायक बना दिया। उसके अनुसार 2018 की संगठनात्मक चुनाव प्रक्रिया, उद्धव का अध्यक्ष होना और सुनील प्रभु की मूल व्हिप नियुक्ति पर्याप्त रिकॉर्ड थे; 1999 संविधान की व्याख्या ने निर्वाचित पार्टी नेतृत्व को उलट दिया।
एक अन्य आपत्ति यह है कि मई 2023 में सुप्रीम कोर्ट भरत गोगावले को व्हिप मानने वाली 3 जुलाई 2022 की अध्यक्षीय कार्रवाई को कानून-विरुद्ध कह चुका था। आलोचकों के अनुसार जनवरी 2024 के आदेश ने वास्तविक पार्टी की नई पहचान के माध्यम से लगभग उसी परिणाम को पुनः स्थापित किया। अध्यक्ष और शिंदे पक्ष का उत्तर है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार प्रासंगिक तारीख पर राजनीतिक दल की स्वतंत्र जाँच की।
आदेश लागू है, लेकिन अंतिम न्यायिक निर्णय नहीं
उद्धव पक्ष ने अध्यक्ष के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। शिंदे पक्ष ने उद्धव समर्थक विधायकों को अयोग्य न ठहराने वाले हिस्से पर भी कानूनी कार्यवाही की। इसलिए 10 जनवरी 2024 का आदेश वर्तमान में लागू संस्थागत निर्णय है, पर उसकी वैधता पर न्यायिक समीक्षा पूरी नहीं हुई है।
वेबसाइट इस अंतर को बनाए रखती है: निर्वाचन आयोग का नाम–चिह्न निर्णय, अध्यक्ष का अयोग्यता आदेश और सुप्रीम कोर्ट का संवैधानिक निर्णय तीन अलग प्रक्रियाएँ हैं। किसी एक का निष्कर्ष दूसरे का पूर्ण विकल्प नहीं है।
अध्यक्ष के पूरे आदेश की धुरी ‘वास्तविक राजनीतिक दल’ की प्रारंभिक पहचान थी। शिंदे पक्ष को वास्तविक दल मानते ही उद्धव पक्ष के जून 2022 निर्देशों की वैधता कमजोर हो गई; दूसरी ओर तामील के प्रमाण के अभाव ने उद्धव विधायकों को शिंदे व्हिप के उल्लंघन से बचाया। परिणाम राजनीतिक रूप से एकतरफा दिखा—सरकार और दल की मान्यता शिंदे पक्ष के पास रही—पर विधायी अयोग्यता में दोनों पक्ष सुरक्षित रहे। अंतिम संवैधानिक मूल्यांकन सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक समीक्षा पर निर्भर है।