1966–2012:
बालासाहेब ठाकरे का दौर
स्थापना, संगठन, प्रमुख विद्रोह और उत्तराधिकार की दस्तावेज़-आधारित पड़ताल

1966 से 2012 तक शिवसेना का इतिहास बालासाहेब ठाकरे के व्यक्तित्व से अलग करके नहीं पढ़ा जा सकता। वे औपचारिक सरकारी पद से बाहर रहे, लेकिन संगठन, राजनीतिक भाषा, गठबंधन और नेतृत्व चयन पर उनका निर्णायक प्रभाव था। इसी केंद्रीकृत नेतृत्व ने पार्टी को स्पष्ट पहचान दी; साथ ही उत्तराधिकार और आंतरिक असहमति को संस्थागत ढंग से सुलझाने की गुंजाइश सीमित रखी।
स्थापना से संगठन तक
राजनीतिक कार्टूनिस्ट बालासाहेब ठाकरे ने 19 जून 1966 को मुंबई में शिवसेना की स्थापना की। इससे पहले उनका साप्ताहिक मार्मिक मराठी अस्मिता और स्थानीय रोजगार के प्रश्न उठा रहा था। शुरुआती शिवसेना ने ‘मराठी मानुष’ को केंद्र में रखा और मुंबई के मोहल्लों तक पहुँचने के लिए शाखा व्यवस्था विकसित की। शाखा केवल पार्टी कार्यालय नहीं थी; वह स्थानीय शिकायत, रोजगार, नागरिक सुविधा और राजनीतिक लामबंदी का केंद्र बनी।
1970 के दशक में बंडू शिंगरे का ‘प्रति शिवसेना’ प्रयास संस्थापक नेतृत्व को चुनौती देने की शुरुआती घटना थी। वह संगठनात्मक विकल्प नहीं बन सका। यह प्रकरण फिर भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि आगे के लगभग सभी विद्रोहों में एक समान प्रश्न दिखाई देता है—क्या शिवसेना में नेतृत्व के समानांतर कोई वैध शक्ति-केंद्र बन सकता था?
1980 के दशक के उत्तरार्ध में शिवसेना का वैचारिक जोर क्षेत्रीय अस्मिता से आगे बढ़कर हिंदुत्व पर अधिक केंद्रित हुआ। भाजपा के साथ गठबंधन ने उसे महाराष्ट्रव्यापी सत्ता के दावेदार में बदला। 1995 में गठबंधन सरकार बनी—मनोहर जोशी और बाद में नारायण राणे मुख्यमंत्री बने, जबकि बालासाहेब पार्टी प्रमुख बने रहे।

छगन भुजबल: पहला बड़ा विधायी विद्रोह
छगन भुजबल शिवसेना के प्रमुख ओबीसी चेहरे और ग्रामीण महाराष्ट्र में संगठन विस्तार के महत्वपूर्ण नेता थे। नेतृत्व और मंडल आयोग से जुड़े राजनीतिक मतभेदों की पृष्ठभूमि में वे समर्थक विधायकों के साथ पार्टी से अलग हुए और कांग्रेस की ओर चले गए। अलग-अलग समकालीन विवरण साथ गए विधायकों की संख्या भिन्न बताते हैं; इसलिए इस संस्करण में किसी एक संख्या को निर्विवाद तथ्य नहीं माना गया है।
इस विद्रोह ने दो बातें स्पष्ट कीं। पहली, शिवसेना का प्रभाव मुंबई से बाहर बढ़ चुका था और क्षेत्रीय-सामाजिक प्रतिनिधित्व संगठन के भीतर शक्ति का स्रोत बन गया था। दूसरी, बालासाहेब की केंद्रीय सत्ता को चुनौती देने वाला नेता पार्टी के भीतर समानांतर मंच कायम नहीं रख सका—अलग होने पर उसे दूसरी पार्टी का सहारा लेना पड़ा।
उत्तराधिकार: लोकप्रियता, परिवार और संगठन
1990 के दशक के अंत तक उत्तराधिकार का प्रश्न खुलकर सामने आने लगा था। राज ठाकरे की भाषण शैली और सार्वजनिक छवि में बालासाहेब की झलक देखी जाती थी; दूसरी ओर उद्धव ठाकरे संगठन, चुनाव प्रबंधन और स्थानीय इकाइयों के साथ क्रमबद्ध ढंग से काम कर रहे थे। 2002 के मुंबई नगर निगम चुनाव में उनकी भूमिका के बाद जनवरी 2003 के महाबलेश्वर अधिवेशन में उद्धव को कार्याध्यक्ष बनाया गया।
यह नियुक्ति केवल पद-वितरण नहीं थी। इससे संकेत मिला कि संस्थापक के बाद पार्टी की कमान ठाकरे परिवार के भीतर रहेगी, पर उत्तराधिकारी राज नहीं, उद्धव होंगे। इसी निर्णय ने 2005–06 के दोनों बड़े संकटों—नारायण राणे और राज ठाकरे के प्रस्थान—की राजनीतिक पृष्ठभूमि तैयार की।



नारायण राणे: सत्ता से निष्कासन तक
नारायण राणे शाखा स्तर से उठकर मुख्यमंत्री पद तक पहुँचे थे। 1999 में उनका मुख्यमंत्री बनना संगठन में उनकी ताकत का प्रमाण था। उद्धव के कार्याध्यक्ष बनने के बाद राणे ने नेतृत्व शैली और पार्टी के भीतर निर्णय प्रक्रिया पर खुला असंतोष व्यक्त किया। 3 जुलाई 2005 को बालासाहेब ठाकरे ने उन्हें पार्टी-विरोधी गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया।
राणे ने बड़ी संख्या में विधायकों के समर्थन का दावा किया, लेकिन वह दावा स्थायी मान्य विधायी विभाजन में नहीं बदल सका। 2003 के 91वें संविधान संशोधन के बाद दल-बदल कानून में एक-तिहाई ‘स्प्लिट’ की सुरक्षा हट चुकी थी; इसलिए पहले की तुलना में अलग समूह बनाने की कानूनी बाधा अधिक थी। राणे कांग्रेस में शामिल हुए और कोंकण में शिवसेना को चुनौती देते रहे।
राज ठाकरे: परिवार के भीतर सबसे बड़ा अलगाव
राज ठाकरे का प्रस्थान विधायी संख्या से अधिक प्रतीकात्मक और संगठनात्मक महत्व रखता था। उन्होंने 27 नवंबर 2005 को शिवसेना छोड़ने की घोषणा की और 9 मार्च 2006 को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई। नई पार्टी ने मराठी अस्मिता की उसी राजनीतिक भूमि पर दावा किया जिस पर शिवसेना खड़ी हुई थी।
2009 के विधानसभा चुनाव में MNS ने 13 सीटें जीतकर विशेष रूप से शहरी महाराष्ट्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इससे स्पष्ट हुआ कि राज का अलग होना केवल परिवार का निजी विवाद नहीं था; उसने शिवसेना के पारंपरिक मराठी मतदाता आधार में वास्तविक प्रतिस्पर्धा पैदा की। फिर भी वह शिवसेना के पूरे संगठन या विधायक दल को अपने साथ नहीं ले जा सके।
बालासाहेब का निधन और नेतृत्व का हस्तांतरण
बालासाहेब ठाकरे का 17 नवंबर 2012 को 86 वर्ष की आयु में निधन हुआ। उस समय तक उद्धव लगभग एक दशक से कार्याध्यक्ष के रूप में संगठन चला रहे थे। इसलिए नेतृत्व परिवर्तन अचानक नहीं था; 2003 से चली प्रक्रिया का औपचारिक समापन था। अगले वर्ष उद्धव पार्टी अध्यक्ष बने।
1966–2012 के दौर का समग्र निष्कर्ष यह है कि शिवसेना ने विद्रोहों को झेला, लेकिन बालासाहेब की जीवित उपस्थिति में कोई विद्रोही पार्टी के मूल नाम, प्रतीक और केंद्रीय संगठन पर अधिकार नहीं कर सका। भुजबल और राणे दूसरी पार्टियों में गए; राज ने नया दल बनाया। 2022 का विभाजन इसी कारण ऐतिहासिक रूप से अलग था—उसमें विद्रोही पक्ष ने विधायक दल के बहुमत के साथ पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर भी दावा किया।
इस कालखंड में शिवसेना की शक्ति और उसकी संस्थागत कमजोरी एक ही स्रोत से निकली—अत्यंत केंद्रीकृत, करिश्माई नेतृत्व। इस मॉडल ने संकट के समय संगठन को एकजुट रखा, लेकिन उत्तराधिकार को लेकर स्पष्ट लोकतांत्रिक प्रक्रिया विकसित नहीं की। 2003 के बाद उत्तराधिकार तय हुआ, किंतु उससे असंतुष्ट प्रमुख शक्ति-केंद्र बाहर चले गए।