दो शिवसेनाओं की चुनावी परीक्षा
2024 के लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों ने उद्धव ठाकरे तथा एकनाथ शिंदे—दोनों पक्षों की वास्तविक ताकत के बारे में क्या बताया?

2024 वह पहला वर्ष था जब शिवसेना के दोनों पक्ष महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा—दो बड़े चुनावों में अलग नाम, अलग चिह्न और विरोधी गठबंधनों के साथ जनता के सामने गए। जून का लोकसभा जनादेश उद्धव ठाकरे के पक्ष की राजनीतिक जीवटता दिखाता है; नवंबर का विधानसभा जनादेश एकनाथ शिंदे के पक्ष की कहीं अधिक व्यापक सीट-क्षमता। इसलिए किसी एक चुनाव के आधार पर पूरी विरासत का अंतिम फैसला सुनाना अधूरा होगा।
सीट, वोट और गठबंधन—तीनों को अलग-अलग पढ़ना होगा
दोनों दल सभी सीटों पर नहीं लड़े। उनके सहयोगी, उम्मीदवार चयन और सीट-वितरण अलग थे। इसलिए पूरे राज्य का वोट प्रतिशत सीधे यह नहीं बताता कि समान परिस्थितियों में कौन अधिक लोकप्रिय था। लड़ी गई सीटें, जीती सीटें, सफलता दर, प्रत्यक्ष मुकाबले और गठबंधन का कुल प्रदर्शन—इन सभी को साथ रखकर ही संतुलित निष्कर्ष निकलता है।
लोकसभा और विधानसभा चुनावों का मतदाता व्यवहार भी एक जैसा होना आवश्यक नहीं। राष्ट्रीय नेतृत्व, स्थानीय उम्मीदवार, सरकारी योजनाएँ, क्षेत्रीय असंतोष और गठबंधन के वोटों का हस्तांतरण—हर चुनाव में इनका भार बदलता है।
महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी आगे रही
48 लोकसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी ने 30 सीटें जीतीं—कांग्रेस 13, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) 9 और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी–शरदचंद्र पवार 8। महायुति के खाते में 17 सीटें आईं—भाजपा 9, एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना 7 और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी 1। सांगली से एक निर्दलीय उम्मीदवार जीता।
यह परिणाम 2022 के विभाजन के बाद उद्धव पक्ष के लिए महत्वपूर्ण था। पार्टी का मूल नाम और धनुष-बाण चिह्न खोने, अधिकांश विधायकों तथा कई सांसदों के शिंदे के साथ जाने के बाद भी उसने नौ लोकसभा सीटें जीतकर दिखाया कि ठाकरे नाम, संगठन का एक हिस्सा और महाविकास अघाड़ी का सामाजिक-राजनीतिक समीकरण चुनावी रूप से प्रभावी बने हुए थे।
उद्धव 9, शिंदे 7—पर अंतर केवल दो सीटों का नहीं था
कुल जीती सीटों में उद्धव पक्ष आगे था, लेकिन शिंदे पक्ष ने कम सीटों पर लड़कर लगभग समान—और मामूली रूप से अधिक—सफलता दर दर्ज की। इससे दो अलग बातें सामने आती हैं: उद्धव पक्ष का संसदीय विस्तार और विपक्षी गठबंधन में उसका वजन अधिक दिखा; शिंदे पक्ष अपने हिस्से की सीटों पर पूरी तरह अप्रभावी नहीं था।
मीडिया रिपोर्टों में दोनों सेनाओं के सीधे लोकसभा मुकाबलों की गणना और परिणाम को लेकर अलग-अलग संख्या मिलती है। इस कारण यह अध्याय उस विवादित गणना को निर्णायक आधार नहीं बनाता। निर्विवाद तथ्य यह है कि राज्य की कुल सीटों और अपने दल की सीटों—दोनों स्तर पर लोकसभा चुनाव ने उद्धव पक्ष को मनोवैज्ञानिक बढ़त दी।
उद्धव ठाकरे की शिवसेना समाप्त नहीं हुई थी। उसने नौ सीटें और मुंबई सहित कई प्रतिष्ठित निर्वाचन क्षेत्रों में जीत दर्ज कर राजनीतिक वैधता बचाई। फिर भी शिंदे शिवसेना की सात जीत बताती हैं कि पार्टी का नाम–चिह्न और सत्ता-संगठन भी वास्तविक चुनावी समर्थन में बदल रहा था।
छह महीने बाद तस्वीर निर्णायक रूप से बदल गई
288 सदस्यीय विधानसभा में महायुति ने भारी बहुमत हासिल किया। भाजपा ने 132, एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने 57 और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने 41 सीटें जीतीं। दूसरी ओर महाविकास अघाड़ी में शिवसेना (UBT) को 20, कांग्रेस को 16 और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी–शरदचंद्र पवार को 10 सीटें मिलीं।
दोनों शिवसेनाओं की अलग तुलना में शिंदे पक्ष ने 81 सीटों पर लड़कर 57 जीतीं—सफलता दर लगभग 70.4 प्रतिशत। उद्धव पक्ष ने 95 सीटों पर लड़कर 20 जीतीं—लगभग 21.1 प्रतिशत। इस स्तर पर अंतर इतना बड़ा था कि विधानसभा चुनाव ने शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना को विधायी ताकत, गठबंधन के भीतर सौदेबाजी और राज्यव्यापी प्रतिनिधित्व—तीनों में स्पष्ट बढ़त दी।
विधानसभा के 49 मुकाबलों में शिंदे पक्ष की बड़ी बढ़त
जहाँ दोनों शिवसेनाओं के उम्मीदवार सीधे आमने-सामने थे, उन 49 विधानसभा सीटों को राजनीतिक विरासत की सबसे साफ परीक्षा माना गया। प्रकाशित निर्वाचन विश्लेषण के अनुसार शिंदे शिवसेना ने इनमें 36 और उद्धव शिवसेना ने 13 सीटें जीतीं। गठबंधन की समग्र लहर का प्रभाव इन मुकाबलों पर भी था, लेकिन इतना बड़ा अंतर केवल चिह्न या नाम की कानूनी मान्यता तक सीमित नहीं था; इससे उम्मीदवार नेटवर्क, संसाधन, स्थानीय संगठन और महायुति के वोट हस्तांतरण की शक्ति भी सामने आई।
यह परिणाम निर्वाचन आयोग या विधानसभा अध्यक्ष के फैसलों का कानूनी पुनर्प्रमाणन नहीं था—कानूनी प्रश्न अपने मंच पर तय होते हैं। पर राजनीतिक अर्थ में इसने शिंदे के दावे को मजबूत किया कि उनके नेतृत्व वाला संगठन मतदाताओं के बड़े हिस्से तक पहुँच बना चुका है।
मुंबई–ठाणे–कोंकण की विरासत भी एकरंगी नहीं रही
लोकसभा में उद्धव पक्ष ने मुंबई की तीन सीटें जीतकर महानगरीय आधार और ठाकरे परिवार की पहचान का प्रभाव दिखाया। शिंदे पक्ष ने ठाणे–कल्याण क्षेत्र में अपनी पकड़ और मुंबई उत्तर-पश्चिम की अत्यंत करीबी जीत के जरिए अपना आधार बचाया। विधानसभा चुनाव में महायुति की लहर ने मुंबई, ठाणे और कोंकण में शिंदे पक्ष को अधिक व्यापक लाभ दिया, जबकि उद्धव पक्ष कुछ शहरी और पारंपरिक क्षेत्रों में सीमित पर टिकाऊ उपस्थिति बनाए रहा।
अर्थात शिवसेना का पुराना मतदाता एक साथ किसी एक पक्ष में स्थानांतरित नहीं हुआ। अलग-अलग क्षेत्र, चुनाव और उम्मीदवार के अनुसार उसका विभाजन हुआ—लेकिन नवंबर 2024 तक इस विभाजित आधार का बड़ा चुनावी हिस्सा शिंदे पक्ष के साथ दिखाई दिया।
2024 ने किस पक्ष को अधिक मजबूत सिद्ध किया?
अंतिम निष्कर्ष इसलिए दो-स्तरीय है। जून 2024 ने सिद्ध किया कि उद्धव ठाकरे अपनी पार्टी की पहचान और समर्थक आधार को बचाने में सफल रहे; नवंबर 2024 ने सिद्ध किया कि तत्कालीन राज्य राजनीति में एकनाथ शिंदे का संगठन अधिक सीटें जिताने वाली मशीन बन चुका था। पूरे वर्ष का संयुक्त चुनावी फैसला शिंदे पक्ष को विधायी और सत्ता-संगठन की बढ़त देता है, पर उद्धव पक्ष को अप्रासंगिक घोषित नहीं करता।
यह भी याद रखना चाहिए कि दोनों परिणाम गठबंधन-आधारित थे। शिंदे की विधानसभा सफलता में भाजपा-नेतृत्व वाली महायुति की व्यापक लहर और उद्धव की लोकसभा सफलता में कांग्रेस तथा शरद पवार पक्ष के साथ विपक्षी तालमेल की महत्वपूर्ण भूमिका थी। इसलिए ‘असली शिवसेना’ का राजनीतिक प्रश्न 2024 में काफी हद तक शिंदे के पक्ष में झुका, लेकिन ठाकरे विरासत पर जनसमर्थन का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ।