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OCN Research Dossier–001 · अध्याय 05

निर्वाचन आयोग का फैसला:
नाम और धनुष-बाण शिंदे पक्ष को क्यों?

Symbols Order के पैरा 15, तीन बहुमत परीक्षणों और 17 फरवरी 2023 के आदेश की सरल व्याख्या

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंस्करण 1.0 · 16 जुलाई 2026
बालासाहेब ठाकरे का चित्र
बालासाहेब ठाकरे। फोटो: Shivraj1980/Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0

17 फरवरी 2023 को निर्वाचन आयोग ने एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले समूह को आधिकारिक ‘शिवसेना’ और उसका आरक्षित चुनाव चिह्न ‘धनुष-बाण’ दिया। यह फैसला इस आधार पर नहीं था कि आयोग ने हिंदुत्व, गठबंधन परिवर्तन या किसी नेता की नैतिक श्रेष्ठता तय की। आयोग ने चुनाव चिह्न आदेश के अंतर्गत उपलब्ध पार्टी रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के संख्यात्मक समर्थन की जाँच की।

कानूनी आधार

निर्वाचन आयोग यह विवाद क्यों तय करता है?

Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के पैरा 15 के अनुसार जब किसी मान्यता-प्राप्त राजनीतिक दल के दो समूह स्वयं को वही दल बताते हैं, तो निर्वाचन आयोग उपलब्ध तथ्यों, परिस्थितियों और दोनों पक्षों की सुनवाई के बाद तय कर सकता है कि कौन-सा समूह उस मान्यता-प्राप्त दल का अधिकारी है—या कोई भी नहीं। आयोग का निर्णय दोनों समूहों पर बाध्यकारी होता है, हालांकि उसे अदालत में चुनौती दी जा सकती है।

यह अधिकार दसवीं अनुसूची के अंतर्गत विधायक की अयोग्यता से अलग है। अयोग्यता का निर्णय विधानसभा अध्यक्ष करते हैं; नाम और चुनाव चिह्न का विवाद निर्वाचन आयोग तय करता है। सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2022 में आयोग की कार्यवाही रोकने से इनकार किया और बाद के संविधान पीठ निर्णय में भी दोनों प्रक्रियाओं को अलग उद्देश्यों वाली माना।

8–10 अक्टूबर 2022

पहले नाम और चिह्न क्यों फ्रीज हुए?

अंधेरी पूर्व विधानसभा उपचुनाव निकट था और दोनों समूह मूल नाम तथा चिह्न पर दावा कर रहे थे। 8 अक्टूबर को आयोग ने अंतिम निर्णय तक दोनों को ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष-बाण’ इस्तेमाल करने से रोका, ताकि मतदाता भ्रम और चुनावी टकराव से बचा जा सके।

अंतरिम व्यवस्था में उद्धव समूह को ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ नाम और ‘जलती मशाल’ चिह्न मिला। शिंदे समूह को ‘बालासाहेबांची शिवसेना’ नाम तथा ‘दो तलवारें और ढाल’ चिह्न दिया गया। यह अस्थायी आवंटन था; इससे वास्तविक शिवसेना का अंतिम निर्धारण नहीं हुआ था।

पैरा 15 की कसौटी

आयोग ने कौन से तीन परीक्षण देखे?

पहला—पार्टी के उद्देश्य और संविधान: क्या किसी समूह का घोषित मार्ग मूल पार्टी के उद्देश्यों से निर्णायक रूप से अलग है? दोनों पक्ष बालासाहेब ठाकरे की विरासत और पार्टी के मूल विचारों पर दावा कर रहे थे, इसलिए यह कसौटी स्पष्ट विजेता नहीं दे सकी।

दूसरा—संगठनात्मक बहुमत: पार्टी की प्रतिनिधि सभा, राष्ट्रीय कार्यकारिणी और अन्य वैध संगठनात्मक निकायों में किसके पास बहुमत है? आयोग को सदस्य-सूची और निर्वाचन प्रक्रिया का ऐसा निर्विवाद रिकॉर्ड नहीं मिला जिससे दोनों दावों को एक ही प्रमाणित मतदाता-सूची पर परखा जा सके।

तीसरा—विधायी बहुमत: विधानसभा, विधान परिषद और संसद में चुने गए प्रतिनिधियों का बहुमत किस समूह के साथ है? पहले दो परीक्षण अनिर्णायक रहने के बाद यही कसौटी निर्णय का आधार बनी।

रिकॉर्ड की समस्या

उद्धव पक्ष का संगठनात्मक दावा निर्णायक क्यों नहीं बना?

उद्धव पक्ष ने पार्टी अध्यक्ष, कार्यकारिणी, पदाधिकारियों और संगठनात्मक समर्थन के आधार पर स्वयं को मूल संगठन बताया। आयोग ने पाया कि उसके रिकॉर्ड में उपलब्ध 1999 के संविधान और 2018 में बताए गए संशोधित ढाँचे के बीच गंभीर अंतर था। आयोग के अनुसार 2018 का संशोधित संविधान उसके रिकॉर्ड में विधिवत उपलब्ध नहीं था और उसमें पार्टी अध्यक्ष को व्यापक नियुक्ति-अधिकार देने वाली व्यवस्था आंतरिक लोकतंत्र के मानकों पर प्रश्न खड़े करती थी।

आयोग ने यह भी कहा कि दोनों पक्षों द्वारा दी गई पदाधिकारी-सूचियाँ ऐसी सत्यापित, साझा सदस्य-सूची पर आधारित नहीं थीं जिससे प्रतिनिधि सभा या संगठनात्मक इकाइयों का वास्तविक कुल बल तथा बहुमत तय किया जा सके। इसलिए संगठनात्मक परीक्षण को ‘अनिर्णायक’ माना गया—इसका अर्थ यह नहीं कि आयोग ने प्रत्येक शिवसैनिक या शाखा का समर्थन शिंदे पक्ष में मान लिया।

निर्णय का केंद्रीय तर्क

आयोग ने शिंदे पक्ष को इसलिए नहीं चुना कि उसके पास सरकार थी। आदेश का घोषित निर्णायक आधार यह था कि सत्यापित संगठनात्मक बहुमत उपलब्ध न होने पर शिंदे समूह के पास शिवसेना के निर्वाचित विधायकों और सांसदों का स्पष्ट बहुमत था।

विधायी विंग का परीक्षण

संख्या शिंदे पक्ष के साथ थी

आयोग के सामने शिंदे पक्ष ने 40 विधायकों और 13 सांसदों का समर्थन प्रस्तुत किया। उद्धव पक्ष के साथ 15 विधायक और लोकसभा के पाँच सांसद बताए गए; विभिन्न प्रस्तुतियों में कुछ दावों और दाखिल हलफनामों की संख्या पर अंतर भी दर्ज हुआ। आयोग ने केवल प्रतिनिधियों की गिनती नहीं देखी, बल्कि 2019 के चुनाव में उन समर्थक विधायकों और सांसदों को मिले मतों का अनुपात भी जोड़ा।

विधानसभा के संदर्भ में शिंदे समर्थक 40 विधायकों को लगभग 36.57 लाख मत मिले थे—शिवसेना उम्मीदवारों को मिले कुल मतों का लगभग 40 प्रतिशत और दोनों पक्षों के विजयी समर्थक विधायकों के मतों में स्पष्ट बहुमत। लोकसभा में शिंदे समर्थक 13 सांसदों के मत शिवसेना के कुल लोकसभा मतों का लगभग 59 प्रतिशत बताए गए। आयोग ने इस संयुक्त विधायी समर्थन को शिंदे समूह के पक्ष में निर्णायक माना।

यहाँ सावधानी आवश्यक है: किसी विधायक को मिले मत को बाद में हुए गुट-विभाजन पर मतदाता की सीधी सहमति नहीं माना जा सकता। आयोग ने इसे उपलब्ध वस्तुनिष्ठ चुनावी आँकड़े के रूप में इस्तेमाल किया, जनमत-संग्रह के रूप में नहीं।

17 फरवरी 2023

अंतिम आदेश में क्या मिला?

आयोग ने शिंदे के नेतृत्व वाले समूह को ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष-बाण’ चिह्न का अधिकारी माना। उद्धव समूह को अंतरिम नाम ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ और ‘जलती मशाल’ चिह्न बनाए रखने की अनुमति दी गई। इस फैसले ने चुनावी पहचान के स्तर पर 1966 में स्थापित पार्टी की मूल मान्यता शिंदे पक्ष को दे दी।

आदेश का राजनीतिक प्रभाव बहुत बड़ा था: शाखाओं, संपत्तियों या प्रत्येक संगठनात्मक इकाई का स्वामित्व स्वतः तय हुए बिना भी चुनावी मतपत्र, प्रत्याशी और आधिकारिक दल-नाम पर शिंदे पक्ष का अधिकार स्थापित हो गया।

क्या तय नहीं हुआ?

नाम–चिह्न का फैसला हर विवाद का फैसला नहीं

निर्वाचन आयोग ने यह तय नहीं किया कि जून 2022 में किस विधायक को दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य होना चाहिए था। उसने राज्यपाल के फ्लोर टेस्ट निर्देश की वैधता, व्हिप की मान्यता या उद्धव सरकार गिरने की संवैधानिक शुद्धता पर भी अंतिम निर्णय नहीं दिया। ये प्रश्न विधानसभा अध्यक्ष और सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में थे।

इसी तरह आयोग का आदेश यह सिद्ध नहीं करता कि हर शिवसेना पदाधिकारी, शाखा सदस्य या मतदाता शिंदे पक्ष के साथ था। संगठनात्मक परीक्षण अनिर्णायक रहने के कारण निर्णय मुख्यतः निर्वाचित प्रतिनिधियों के बहुमत पर आधारित था—और यही आदेश की सबसे बड़ी शक्ति तथा सबसे अधिक आलोचित सीमा दोनों है।

न्यायिक स्थिति · 16 जुलाई 2026

उद्धव पक्ष की चुनौती अभी लंबित

उद्धव ठाकरे पक्ष ने आयोग के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उसकी प्रमुख आपत्तियों में विधायी बहुमत को अत्यधिक महत्व देना, संगठनात्मक नेतृत्व की अनदेखी और उन विधायकों के समर्थन पर भरोसा करना शामिल है जिनकी अयोग्यता पर विवाद था। सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल आदेश स्थगित नहीं किया; इसलिए शिंदे पक्ष नाम और ‘धनुष-बाण’ का उपयोग करता रहा।

उपलब्ध नवीनतम न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार मूल चुनौती अभी अंतिम निर्णय की प्रतीक्षा में है। इसलिए वेबसाइट इसे ‘लागू निर्वाचन आयोग आदेश’ के रूप में दर्ज करती है, ‘अंतिम सर्वोच्च न्यायिक सत्य’ के रूप में नहीं। अंतिम फैसला आने पर अध्याय का संशोधित संस्करण जारी किया जाएगा।

OCN ऐतिहासिक आकलन

शिंदे पक्ष की सफलता का मूल कारण विधायी संख्या थी, जबकि उद्धव पक्ष की कमजोरी संगठनात्मक समर्थन को ऐसी निर्विवाद सदस्य-सूची और आयोग-मान्य संविधान से सिद्ध न कर पाना रहा जिसे संख्यात्मक रूप से परखा जा सके। आयोग ने उपलब्ध प्रमाण में सबसे मापने योग्य कसौटी चुनी; लेकिन इस तरीके ने यह बड़ा लोकतांत्रिक प्रश्न छोड़ा कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का बाद का निर्णय पार्टी कार्यकर्ताओं और मूल मतदाताओं की सामूहिक इच्छा का कितना सटीक प्रतिनिधित्व करता है।

स्रोत रजिस्टर

प्रमुख संदर्भ

निर्वाचन आयोगDispute Case No. 1 of 2022—अंतरिम आदेश 8 अक्टूबर 2022 और अंतिम आदेश 17 फरवरी 2023The Indian Expressआयोग के तीन परीक्षण और संगठनात्मक बहुमत अनिर्णायक रहने की व्याख्याIndian Express ExplainedSymbols Order के पैरा 15 और निर्णय-पद्धतिThe Indian Expressअक्टूबर 2022 के अस्थायी नाम और चुनाव चिह्नसुप्रीम कोर्टआयोग और अध्यक्ष के अलग अधिकार क्षेत्रों पर संविधान पीठ का निर्णयHindustan Timesआयोग आदेश के विरुद्ध लंबित सुप्रीम कोर्ट चुनौती