omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHERहर समाचार का दस्तावेज़ीकरण,
हर विश्लेषण का प्रमाण।
OCN Research Dossier–001 · अध्याय 03

2019–2022:
MVA सरकार और विद्रोह की पृष्ठभूमि

तीन दलों की सत्ता-साझेदारी, शिवसेना की आंतरिक असहजता और एकनाथ शिंदे के उभार का दस्तावेज़ी अध्ययन

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंस्करण 1.0 · 16 जुलाई 2026
उद्धव ठाकरे का चित्र
उद्धव ठाकरे। फोटो: Webman25/Wikimedia Commons, Public Domain

महाविकास अघाड़ी का जन्म एक असाधारण राजनीतिक समझौते से हुआ। हिंदुत्व और मराठी अस्मिता पर बनी शिवसेना ने कांग्रेस तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाई। यह गठबंधन लगभग ढाई वर्ष चला, कोविड महामारी जैसी असाधारण चुनौती से गुजरा और अंततः शिवसेना के अपने विधायक दल के बड़े विद्रोह से गिरा। विद्रोह अचानक दिखाई दिया, लेकिन उसकी राजनीतिक, वैचारिक और संगठनात्मक पृष्ठभूमि पहले से बन रही थी।

28 नवंबर 2019

विरोधी दलों से साझा सरकार तक

भाजपा के साथ मुख्यमंत्री पद पर सहमति न बनने के बाद शिवसेना, NCP और कांग्रेस ने महाविकास अघाड़ी बनाई। साझा न्यूनतम कार्यक्रम ने वैचारिक मतभेदों को पीछे रखकर किसानों की ऋण-माफी, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, महिलाओं की सुरक्षा और राज्य के विकास को शासन का सार्वजनिक आधार बनाया। उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

यह शिवसेना के इतिहास में दोहरा परिवर्तन था। पहली बार ठाकरे परिवार का कोई सदस्य संवैधानिक पद पर आया और पहली बार पार्टी ने भाजपा-विरोधी राष्ट्रीय दलों के साथ दीर्घकालीन सत्ता-साझेदारी स्वीकार की। गठबंधन समर्थकों ने इसे महाराष्ट्र-केंद्रित व्यावहारिक व्यवस्था कहा; भाजपा और शिवसेना के भीतर आलोचकों ने इसे चुनाव-पूर्व वैचारिक जनादेश से विचलन बताया।

2019–20

मुख्यमंत्री शिवसेना का, सत्ता तीन केंद्रों में

मुख्यमंत्री पद शिवसेना के पास था, लेकिन गठबंधन की वास्तविक शक्ति तीन नेतृत्व-केंद्रों में बँटी थी। NCP प्रमुख शरद पवार गठबंधन के प्रमुख राजनीतिक संयोजक बने; अजित पवार को उपमुख्यमंत्री तथा वित्त विभाग मिला; कांग्रेस भी मंत्रिमंडल और विधानसभा में आवश्यक भागीदार थी। शिवसेना के एकनाथ शिंदे को नगर विकास और सार्वजनिक निर्माण जैसे प्रभावशाली दायित्व मिले।

यह संरचना सरकार चलाने के लिए आवश्यक थी, पर शिवसेना विधायकों के लिए नई प्रतिस्पर्धा भी लाई। निर्वाचन क्षेत्रों में NCP और कांग्रेस के स्थानीय नेता उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी थे। सरकार साझा होने पर निधि, प्रशासनिक पहुँच और अगला चुनाव किसके साथ लड़ा जाएगा—ये प्रश्न लगातार बने रहे। बाद में विद्रोही विधायकों ने आरोप लगाया कि सहयोगी दल, विशेषकर NCP, शिवसेना के राजनीतिक क्षेत्र में मजबूत हो रहे थे। यह उनका राजनीतिक दावा था; अपने आप में सिद्ध संस्थागत निष्कर्ष नहीं।

मार्च 2020–2021

कोविड: प्रशासनिक परीक्षा और संगठनात्मक दूरी

सरकार बनने के कुछ ही महीनों बाद कोविड-19 महामारी शुरू हो गई। महाराष्ट्र लंबे समय तक देश के सर्वाधिक प्रभावित राज्यों में रहा। उद्धव ठाकरे की नियमित वीडियो-संवाद शैली और मुंबई में स्वास्थ्य प्रबंधन को समर्थन मिला, लेकिन संक्रमण, मृत्यु, लॉकडाउन और राजस्व हानि ने सरकार पर भारी दबाव डाला। इस अध्याय का उद्देश्य महामारी प्रबंधन का अंतिम मूल्यांकन करना नहीं, उसके राजनीतिक प्रभाव को समझना है।

मुख्यमंत्री की स्वास्थ्य-संबंधी सीमाएँ, कोविड प्रोटोकॉल और केंद्रीकृत निर्णय-प्रक्रिया ने विधायकों तथा कार्यकर्ताओं से प्रत्यक्ष संपर्क घटाया। बाद में कई बागी विधायकों ने मुख्यमंत्री तक पहुँच न होने और चुनिंदा मध्यस्थों के माध्यम से संवाद होने की शिकायत की। उद्धव पक्ष ने इन आरोपों को विद्रोह का औचित्य सिद्ध करने वाला बाद का आख्यान माना और भाजपा पर सरकार अस्थिर करने का आरोप लगाया। उपलब्ध रिकॉर्ड दोनों पक्षों के आरोप दर्ज करता है; किसी एक राजनीतिक मंशा को न्यायिक रूप से सिद्ध तथ्य नहीं बनाता।

गठबंधन का मूल विरोधाभास

सरकार की स्थिरता तीनों दलों की विधायी संख्या पर निर्भर थी, जबकि शिवसेना की संगठनात्मक पहचान दशकों से कांग्रेस–NCP विरोध और हिंदुत्व की राजनीति से बनी थी। सत्ता में सहयोग तथा स्थानीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा—दोनों एक साथ चलते रहे।

2020–22

हिंदुत्व, भाजपा और साझा पहचान का प्रश्न

शिवसेना नेतृत्व ने कहा कि उसने भाजपा छोड़ी है, हिंदुत्व नहीं। इसके बावजूद मंदिर, नागरिकता, सावरकर, अयोध्या और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर गठबंधन भागीदारों की भाषा अलग रही। भाजपा ने इन्हीं मतभेदों को उद्धव के नेतृत्व पर वैचारिक हमले का आधार बनाया। शिवसेना के भीतर उन नेताओं के लिए यह प्रश्न अधिक कठिन था जिनका राजनीतिक विकास भाजपा के साथ गठबंधन में हुआ था।

दूसरी ओर MVA ने अपनी वैधता कल्याणकारी कार्यक्रम, किसान नीति और महाराष्ट्र के अधिकारों पर आधारित करने का प्रयास किया। इसलिए संघर्ष केवल ‘हिंदुत्व बनाम धर्मनिरपेक्षता’ जितना सरल नहीं था; यह पार्टी की पुरानी पहचान, नई सत्ता-व्यवस्था और अगली चुनावी रणनीति के बीच संतुलन का प्रश्न था।

संगठन का दूसरा शक्ति-केंद्र

एकनाथ शिंदे क्यों निर्णायक बने?

ठाणे से निकले एकनाथ शिंदे शाखा, महानगरपालिका और विधानसभा राजनीति के रास्ते शिवसेना के सबसे प्रभावशाली जनाधार वाले नेताओं में आए। वे 2014–19 की फडणवीस सरकार में भी मंत्री रहे और MVA सरकार में नगर विकास जैसे बड़े विभाग के प्रभारी बने। बड़ी संख्या में विधायकों के साथ उनके व्यक्तिगत तथा प्रशासनिक संबंध थे।

शिंदे ठाकरे परिवार के बाहर वह नेता बने जो संगठन, संसाधन, विधायकों और भाजपा—चारों स्तरों की राजनीति समझते थे। विद्रोह के बाद उन्होंने कहा कि NCP शिवसेना को कमजोर कर रही थी, नेतृत्व उनकी बात नहीं सुन रहा था और कांग्रेस–NCP के साथ गठबंधन से पार्टी अपने हिंदुत्व मार्ग से हट गई थी। उद्धव पक्ष ने जवाब दिया कि उन्हें महत्वपूर्ण विभाग और संगठनात्मक प्रतिष्ठा मिली थी; इसलिए असंतोष की व्याख्या केवल उपेक्षा से नहीं की जा सकती।

10 और 20 जून 2022

दो चुनाव, दो गंभीर चेतावनियाँ

10 जून के राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने अपनी घोषित संख्या से अधिक समर्थन जुटाकर तीसरी सीट जीती। 20 जून के विधान परिषद चुनाव में भाजपा के सभी पाँच उम्मीदवार जीत गए और MVA की अपेक्षित संख्या में सेंध दिखाई दी। गुप्त मतदान के कारण प्रत्येक मतदाता विधायक की पहचान सार्वजनिक रूप से निर्णायक नहीं की जा सकती, पर परिणाम ने गठबंधन प्रबंधन और आंतरिक अनुशासन की कमजोरी उजागर कर दी।

विधान परिषद मतदान के कुछ घंटों बाद शिंदे और शिवसेना विधायकों का एक समूह संपर्क से बाहर हुआ और गुजरात के सूरत पहुँचा। यह संकेत था कि मामला कुछ असंतुष्ट विधायकों का दबाव नहीं, पहले से समन्वित बड़े शक्ति-परीक्षण में बदल चुका है।

20–22 जून 2022

सूरत से गुवाहाटी: विद्रोह सार्वजनिक हुआ

शिंदे के साथ गए विधायकों की संख्या शुरुआती घंटों में बदलती रही; इसलिए प्रारंभिक मीडिया संख्याओं को अंतिम तथ्य नहीं माना जा सकता। 21 जून को शिवसेना ने शिंदे को विधायक दल के नेता पद से हटाकर अजय चौधरी को नियुक्त करने की कोशिश की। 22 जून को बागी समूह गुवाहाटी पहुँचा और शिंदे ने अपने साथ पर्याप्त विधायकों का दावा किया।

बागियों की प्रमुख सार्वजनिक मांग थी कि शिवसेना MVA छोड़कर भाजपा के साथ लौटे। उद्धव ठाकरे ने संवाद और इस्तीफे की तत्परता जताई, जबकि पार्टी नेतृत्व ने विधायकों को बैठक में उपस्थित होने का निर्देश दिया। यहीं से संगठनात्मक विद्रोह संविधान, दसवीं अनुसूची, व्हिप, राज्यपाल और विधानसभा बहुमत से जुड़े विवाद में बदल गया। उसका विस्तृत अध्ययन अगले अध्याय में होगा।

OCN ऐतिहासिक आकलन

एकनाथ शिंदे का विद्रोह केवल वैचारिक असहमति या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से नहीं समझा जा सकता। इसकी पृष्ठभूमि में भाजपा–शिवसेना की पुरानी निकटता, MVA के भीतर स्थानीय प्रतिस्पर्धा, नेतृत्व तक पहुँच की शिकायतें, शिंदे का स्वतंत्र विधायक-नेटवर्क और 2022 के चुनावों में अनुशासन टूटने के संकेत—सभी शामिल थे। इन कारणों ने विद्रोह के लिए भूमि तैयार की; लेकिन विद्रोह का संचालन, बाहरी राजनीतिक सहयोग और संवैधानिक वैधता अलग प्रश्न हैं, जिनकी जाँच अगले अध्याय में आवश्यक है।

स्रोत रजिस्टर

प्रमुख संदर्भ

Mumbai Mirrorमहाविकास अघाड़ी का साझा न्यूनतम कार्यक्रम—28 नवंबर 2019सुप्रीम कोर्टSubhash Desai निर्णय—MVA और जून 2022 संकट की प्रमाणित संवैधानिक समयरेखाHindustan TimesMVA का पहला वर्ष, कोविड प्रबंधन और आर्थिक दबावThe Indian Expressशिवसेना विधायकों की असंतुष्टि और नेतृत्व-संपर्क का संदर्भThe Indian Expressबागी विधायकों की शिकायतों वाला सार्वजनिक पत्रThe Indian Expressसूरत से गुवाहाटी तक जून 2022 घटनाक्रमThe New Indian Expressशिंदे द्वारा बताए गए विद्रोह के कारण—दावे के रूप में दर्ज