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OCN Research Dossier–001 · अध्याय 02

2012–2019:
उद्धव का नेतृत्व और भाजपा से टकराव

उत्तराधिकार, गठबंधन की बदलती शक्ति-संरचना और महाराष्ट्र की सत्ता पर निर्णायक संघर्ष

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंस्करण 1.0 · 16 जुलाई 2026
उद्धव ठाकरे का चित्र
उद्धव ठाकरे। फोटो: Webman25/Wikimedia Commons, Public Domain

बालासाहेब ठाकरे के निधन के बाद उद्धव ठाकरे को विरासत में केवल एक पार्टी नहीं मिली; उन्हें ऐसी गठबंधन-व्यवस्था भी मिली जिसमें शिवसेना लंबे समय तक महाराष्ट्र की वरिष्ठ साझेदार रही थी। 2014 के बाद भाजपा का राष्ट्रीय और प्रादेशिक विस्तार इस संतुलन को उलट गया। 2012–2019 का काल इसी बदली हुई शक्ति-संरचना के प्रति शिवसेना की प्रतिक्रिया और अंततः उससे बाहर निकलने की कहानी है।

जनवरी 2013

औपचारिक उत्तराधिकार और नई नेतृत्व शैली

23 जनवरी 2013 को शिवसेना की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने उद्धव ठाकरे को सर्वसम्मति से पार्टी अध्यक्ष चुना। वे 2003 से कार्याध्यक्ष के रूप में संगठन संभाल रहे थे, इसलिए यह अचानक सत्ता-परिवर्तन नहीं था। फिर भी पहली बार पार्टी को बालासाहेब की प्रत्यक्ष उपस्थिति के बिना चुनाव, गठबंधन और नेतृत्व के कठिन प्रश्न तय करने थे।

उद्धव की कार्यशैली बालासाहेब की जनसभा-केंद्रित और व्यक्तिगत नियंत्रण वाली शैली से अलग मानी गई। उन्होंने संगठन, स्थानीय निकाय, उम्मीदवार चयन और चुनावी प्रबंधन पर अधिक क्रमबद्ध जोर दिया। इसी दौर में आदित्य ठाकरे युवा नेतृत्व के रूप में आगे आए और 2018 में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बनाए गए। यह दूसरी पीढ़ी से तीसरी पीढ़ी की ओर संस्थागत तैयारी का संकेत था।

25 सितंबर 2014

पच्चीस वर्ष पुराना गठबंधन टूटा

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा–शिवसेना साथ थे, लेकिन अक्टूबर के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले सीट बँटवारे पर सहमति नहीं बनी। शिवसेना अपने वरिष्ठ सहयोगी वाले पुराने अनुपात को बचाना चाहती थी; लोकसभा विजय के बाद मजबूत हुई भाजपा अधिक विधानसभा सीटों की मांग कर रही थी। 25 सितंबर को दोनों दलों ने अलग चुनाव लड़ने का निर्णय लिया।

परिणाम ने गठबंधन की शक्ति-व्यवस्था स्थायी रूप से बदल दी। भाजपा 122 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी, जबकि शिवसेना को 63 सीटें मिलीं। पहली बार भाजपा महाराष्ट्र में शिवसेना से स्पष्ट रूप से बड़ी शक्ति बन गई और देवेंद्र फडणवीस मुख्यमंत्री बने। उद्धव के सामने विकल्प था—विपक्ष में रहकर भाजपा का मुकाबला करना या सत्ता में शामिल होकर संगठनात्मक प्रभाव बनाए रखना।

निर्णायक परिवर्तन

1989 से 2014 तक शिवसेना महाराष्ट्र में गठबंधन की वरिष्ठ शक्ति थी। 2014 के जनादेश ने पदानुक्रम पलट दिया। इसके बाद का टकराव केवल विचारधारा का नहीं, सीटों, मुख्यमंत्री पद, मुंबई के नियंत्रण और दोनों दलों के समान मतदाता आधार पर वर्चस्व का संघर्ष था।

दिसंबर 2014–2016

सरकार में सहयोगी, सार्वजनिक विमर्श में विरोधी

प्रारंभिक दूरी के बाद 5 दिसंबर 2014 को शिवसेना फडणवीस सरकार में शामिल हुई। इस व्यवस्था ने सरकार को स्थिरता दी और शिवसेना को मंत्री पद मिले, पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा समाप्त नहीं हुई। पार्टी के मुखपत्र सामना और उसके नेताओं ने केंद्र तथा राज्य सरकार की नीतियों पर बार-बार आलोचनात्मक रुख अपनाया। भाजपा भी अब महाराष्ट्र में अपने स्वतंत्र संगठन को तेजी से बढ़ा रही थी।

यह एक असामान्य गठबंधन था: दोनों दल सत्ता साझा कर रहे थे, लेकिन नगरपालिका चुनावों, स्थानीय संगठन और सार्वजनिक राजनीतिक संदेश में प्रतिद्वंद्वी बनते जा रहे थे। शिवसेना सरकार से अलग नहीं हुई; साथ ही उसने भाजपा की अधीनस्थ सहयोगी वाली भूमिका भी स्वीकार नहीं की। यही दोहरा व्यवहार 2019 तक संबंधों की पहचान रहा।

फरवरी 2017

मुंबई में सीधी लड़ाई

2017 का बृहन्मुंबई महानगरपालिका चुनाव दोनों दलों के बीच वास्तविक शक्ति-परीक्षण था। चुनाव अलग-अलग लड़ने पर शिवसेना ने 84 और भाजपा ने 82 सीटें जीतीं। शिवसेना सबसे बड़ा दल बनी रही, लेकिन भाजपा उसके लगभग बराबर पहुँच गई। मुंबई—जहाँ शाखा नेटवर्क, महानगरपालिका और मराठी राजनीति शिवसेना की केंद्रीय शक्ति रहे थे—में यह परिणाम रणनीतिक चेतावनी था।

नगरपालिका परिणाम ने दिखाया कि भाजपा केवल राज्य और केंद्र की बड़ी सहयोगी नहीं रही; वह शिवसेना के सबसे सुरक्षित शहरी आधार में भी सीधी चुनौती बन चुकी थी। इसी पृष्ठभूमि में जनवरी 2018 की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने लोकसभा और विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया।

18 फरवरी 2019

घोषित अलगाव के बाद पुनर्गठबंधन

अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा के लगभग तेरह महीने बाद शिवसेना और भाजपा फिर साथ आए। फरवरी 2019 के लोकसभा समझौते में भाजपा ने 25 और शिवसेना ने 23 सीटों पर चुनाव लड़ा। परिणाम प्रभावी रहा—महाराष्ट्र में भाजपा ने 23 और शिवसेना ने 18 लोकसभा सीटें जीतीं। इससे प्रमाणित हुआ कि साझा मतदाता आधार के कारण चुनावी स्तर पर दोनों को गठबंधन से लाभ था।

इसी समझौते के समय भविष्य के सत्ता-विभाजन पर क्या तय हुआ, वही बाद में सबसे बड़ा विवाद बना। शिवसेना ने कहा कि पदों और जिम्मेदारियों की बराबर साझेदारी तथा मुख्यमंत्री पद के ढाई-ढाई वर्ष के बँटवारे की सहमति हुई थी। भाजपा नेतृत्व ने चुनाव परिणाम के बाद इस व्याख्या को अस्वीकार किया। उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड किसी हस्ताक्षरित समझौते को सामने नहीं रखता; इसलिए दोनों दावों को अलग-अलग दर्ज करना आवश्यक है।

अक्टूबर–नवंबर 2019

जनादेश साथ, सरकार अलग

2019 का विधानसभा चुनाव दोनों दलों ने गठबंधन में लड़ा। 24 अक्टूबर को आए परिणाम में भाजपा को 105 और शिवसेना को 56 सीटें मिलीं—मिलकर स्पष्ट बहुमत, लेकिन भाजपा 2014 की तुलना में कमजोर हुई थी। शिवसेना ने इसी परिणाम को बराबर सत्ता-साझेदारी और मुख्यमंत्री पद की मांग लागू कराने का अवसर माना। भाजपा ने मुख्यमंत्री पद बाँटने से इनकार किया और वार्ता रुक गई।

आगे की घटनाएँ तेजी से बदलीं: भाजपा ने पर्याप्त समर्थन न होने की बात कहकर सरकार बनाने से इनकार किया; शिवसेना के केंद्रीय मंत्री अरविंद सावंत ने इस्तीफा दिया; राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा; और शिवसेना ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तथा कांग्रेस के साथ बातचीत शुरू की। 23 नवंबर को देवेंद्र फडणवीस ने अजित पवार के साथ अचानक शपथ ली, लेकिन यह सरकार बहुमत परीक्षण से पहले गिर गई। 28 नवंबर को उद्धव ठाकरे महाविकास अघाड़ी सरकार के मुख्यमंत्री बने।

यह केवल गठबंधन परिवर्तन नहीं था। पहली बार ठाकरे परिवार का कोई सदस्य संवैधानिक पद पर आया और शिवसेना ने अपने पुराने वैचारिक प्रतिद्वंद्वियों के साथ सरकार बनाई। समर्थकों के लिए यह भाजपा के कथित अधूरे वचन के विरुद्ध सत्ता-संतुलन था; आलोचकों के लिए चुनाव-पूर्व जनादेश से विचलन। दोनों व्याख्याएँ आगे 2022 के विद्रोह में फिर निर्णायक तर्क बनीं।

OCN ऐतिहासिक आकलन

2012–2019 में उद्धव ठाकरे ने पार्टी पर संगठनात्मक नियंत्रण कायम रखा, लेकिन भाजपा के साथ पुराने वरिष्ठ–कनिष्ठ समीकरण को नहीं बचा सके। 2014 ने भाजपा को महाराष्ट्र में बड़ी शक्ति बनाया, 2017 ने मुंबई में शिवसेना की विशिष्टता को चुनौती दी और 2019 ने मुख्यमंत्री पद को संबंधों की अंतिम कसौटी बना दिया। सत्ता प्राप्त करने में उद्धव सफल रहे, पर कांग्रेस–NCP के साथ गठबंधन ने शिवसेना के भीतर वैचारिक और नेतृत्वगत तनाव की नई भूमि तैयार कर दी।

स्रोत रजिस्टर

प्रमुख संदर्भ

Times of Indiaउद्धव ठाकरे का पार्टी अध्यक्ष चुना जाना—23 जनवरी 2013The Indian Express2014 में भाजपा–शिवसेना गठबंधन का टूटनाNDTV / PTIशिवसेना का फडणवीस सरकार में शामिल होना—5 दिसंबर 2014The Indian Express2017 BMC शक्ति-संतुलन—शिवसेना 84, भाजपा 82The Indian Express2018 में अकेले चुनाव लड़ने का राष्ट्रीय कार्यकारिणी प्रस्तावThe Indian Expressफरवरी 2019 का पुनर्गठबंधन और लोकसभा सीट समझौताThe Indian Express2019 सरकार गठन संकट की समयरेखा और विधानसभा संख्याThe Indian Expressआदित्य ठाकरे का चुनावी प्रवेश—2019