सुप्रीम कोर्ट का मई 2023 निर्णय
राज्यपाल, व्हिप, अध्यक्ष, निर्वाचन आयोग और उद्धव सरकार की बहाली पर संविधान पीठ के वास्तविक निष्कर्ष

11 मई 2023 का Subhash Desai बनाम Principal Secretary, Governor of Maharashtra निर्णय जून 2022 के सत्ता परिवर्तन को समझने का केंद्रीय संवैधानिक दस्तावेज़ है। पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने राज्यपाल और विधानसभा अध्यक्ष की कुछ कार्रवाइयों को कानून के अनुरूप नहीं माना, लेकिन उद्धव ठाकरे सरकार को बहाल भी नहीं किया। इसीलिए निर्णय को किसी एक पक्ष की पूर्ण जीत या हार कहना अधूरा है।
मामला और संविधान पीठ
मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय पीठ में न्यायमूर्ति एम.आर. शाह, कृष्ण मुरारी, हिमा कोहली और पी.एस. नरसिम्हा शामिल थे। पीठ के सामने शिवसेना विधायकों की अयोग्यता, उपाध्यक्ष की शक्ति, राज्यपाल का फ्लोर टेस्ट, विधानसभा अध्यक्ष द्वारा नेता और व्हिप की मान्यता, निर्वाचन आयोग की समानांतर कार्यवाही तथा सरकार की बहाली से जुड़े प्रश्न थे।
अदालत ने दलबदल-विरोधी कानून को केवल विधायकों की संख्या का प्रश्न नहीं माना। उसने बार-बार ‘राजनीतिक दल’ और ‘विधायक दल’ को अलग संस्थाएँ बताया। विधायक सदन में राजनीतिक दल के प्रतिनिधि होते हैं; विधायक दल का बहुमत अकेले राजनीतिक दल की संगठनात्मक इच्छा का स्थान नहीं ले सकता।
राज्यपाल के पास वस्तुनिष्ठ आधार नहीं था
राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने 28 जून 2022 को उद्धव सरकार को 30 जून तक विश्वास मत लेने का निर्देश दिया था। संविधान पीठ ने कहा कि उनके सामने ऐसा वस्तुनिष्ठ दस्तावेज़ नहीं था जिससे यह निष्कर्ष निकले कि सरकार सदन का विश्वास खो चुकी है। शिंदे समर्थक विधायकों ने शिवसेना नेतृत्व और MVA गठबंधन पर असंतोष जताया था, लेकिन उन्होंने राज्यपाल को यह स्पष्ट नहीं कहा था कि वे सरकार से समर्थन वापस ले रहे हैं।
अदालत के अनुसार किसी दल का आंतरिक विवाद सुलझाने के लिए फ्लोर टेस्ट का उपयोग नहीं किया जा सकता। राज्यपाल राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करके यह तय नहीं कर सकते कि पार्टी का कौन-सा समूह वास्तविक है। विधायकों की सुरक्षा संबंधी आशंकाएँ या मंत्री पद से असंतोष भी अपने आप सरकार के बहुमत खोने का प्रमाण नहीं थे। इसलिए फ्लोर टेस्ट बुलाने का निर्णय कानून के अनुसार उचित नहीं था।
सदन में बहुमत का परीक्षण लोकतांत्रिक साधन है, लेकिन राज्यपाल उसे राजनीतिक दल के आंतरिक मतभेद निपटाने या दलबदल को वैधता देने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकते। पहले यह दिखाने वाली वस्तुनिष्ठ सामग्री आवश्यक है कि मंत्रिपरिषद ने सदन का विश्वास खो दिया है।
व्हिप नियुक्त करने का अधिकार किसका?
संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि दसवीं अनुसूची के संदर्भ में व्हिप की नियुक्ति राजनीतिक दल करता है, केवल विधायक दल नहीं। व्हिप का उद्देश्य सदन में निर्वाचित सदस्यों को उस राजनीतिक संगठन की दिशा से बाँधना है जिसके उम्मीदवार के रूप में वे चुने गए। यदि विधायक दल का बहुमत ही अपना अलग व्हिप नियुक्त कर सके, तो दलबदल-विरोधी कानून का उद्देश्य निष्प्रभावी हो जाएगा।
3 जुलाई 2022 को विधानसभा अध्यक्ष ने शिंदे पक्ष के भरत गोगावले को शिवसेना का मुख्य सचेतक माना था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मान्यता को कानून-विरुद्ध बताया, क्योंकि अध्यक्ष ने यह जाँच नहीं की कि शिवसेना राजनीतिक दल द्वारा अधिकृत व्हिप कौन था। केवल शिंदे समर्थक विधायकों के प्रस्ताव पर भरोसा पर्याप्त नहीं था।
अध्यक्ष को पहले वास्तविक राजनीतिक दल पहचानना था
अदालत ने विधायकों को स्वयं तत्काल अयोग्य या योग्य घोषित नहीं किया। उसने कहा कि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाओं पर प्रथम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष को करना चाहिए। इसके लिए अध्यक्ष को विभाजन के समय उपलब्ध पार्टी संविधान, नेतृत्व-संरचना और अन्य सामग्री के आधार पर यह पहचानना था कि ‘राजनीतिक दल’ का अधिकृत नेतृत्व कौन था।
अध्यक्ष केवल इस आधार पर निर्णय नहीं कर सकते थे कि किस समूह के पास अधिक विधायक हैं या निर्वाचन आयोग ने बाद में किसे नाम–चिह्न दिया। अयोग्यता का प्रश्न उस तारीख के आचरण और उस समय की पार्टी दिशा के आधार पर तय होना था। अदालत ने निर्णय उचित अवधि में करने का निर्देश दिया; इसके बाद देरी को लेकर फिर सुप्रीम कोर्ट की निगरानी आवश्यक हुई।
निर्वाचन आयोग को प्रतीक्षा क्यों नहीं करनी थी?
उद्धव पक्ष का तर्क था कि विधायकों की अयोग्यता तय हुए बिना निर्वाचन आयोग को पार्टी नाम और चिह्न पर निर्णय नहीं करना चाहिए। संविधान पीठ ने यह स्वीकार नहीं किया। उसके अनुसार निर्वाचन आयोग Symbols Order के पैरा 15 के अंतर्गत और अध्यक्ष दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अलग प्रश्न तय करते हैं; एक प्रक्रिया का परिणाम दूसरी के लिए स्वतः निर्णायक नहीं है।
इसलिए आयोग की कार्यवाही समानांतर चल सकती थी। फिर भी आयोग को अपने मामले के तथ्यों के अनुरूप उचित परीक्षण अपनाना था। अयोग्यता याचिका लंबित होने से विधायक का समर्थन आयोग के सामने स्वतः अप्रासंगिक नहीं हो जाता, और आयोग का नाम–चिह्न निर्णय विधायक को अयोग्यता से स्वतः सुरक्षित नहीं करता।
उद्धव सरकार बहाल क्यों नहीं हुई?
अदालत ने राज्यपाल का फ्लोर टेस्ट निर्देश गलत माना, पर 29 जून 2022 की स्थिति वापस स्थापित नहीं की। कारण यह था कि उद्धव ठाकरे ने निर्धारित फ्लोर टेस्ट का सामना किए बिना मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। अदालत ने कहा कि वह ऐसे मुख्यमंत्री को पुनः पद पर नहीं बैठा सकती जिसने विश्वास मत में पराजित होने या राज्यपाल द्वारा हटाए जाने के बजाय स्वयं इस्तीफा दिया हो।
निर्णय का अर्थ यह नहीं था कि राज्यपाल की गलती महत्वहीन हो गई। अदालत ने संवैधानिक सीमा स्पष्ट की, लेकिन उपलब्ध उपचार को ठाकरे के इस्तीफे ने सीमित कर दिया। यदि वे फ्लोर टेस्ट का सामना करते और गैरकानूनी प्रक्रिया के कारण पद से हटते, तो न्यायिक उपचार का प्रश्न अलग हो सकता था; अदालत ने काल्पनिक परिणाम तय नहीं किया।
शिंदे सरकार की नियुक्ति क्यों नहीं रद्द हुई?
उद्धव ठाकरे के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री पद रिक्त हुआ। देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे ने समर्थक विधायकों के साथ सरकार बनाने का दावा पेश किया। अदालत ने कहा कि इन परिस्थितियों में राज्यपाल द्वारा शिंदे को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करने का 30 जून का निर्णय उचित था। यह 28 जून के फ्लोर टेस्ट निर्देश से अलग संवैधानिक कार्रवाई थी।
इसलिए फैसले ने एक साथ दो बातें कहीं: उद्धव सरकार को फ्लोर टेस्ट के लिए बुलाने का आधार गलत था; किंतु उनके इस्तीफे के बाद संख्या प्रस्तुत करने वाले गठबंधन को सरकार बनाने के लिए बुलाना गलत नहीं था।
अध्यक्ष-विरोधी नोटिस का प्रश्न बड़ी पीठ को
2016 के Nabam Rebia निर्णय में कहा गया था कि अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव लंबित हो तो वे विधायकों की अयोग्यता तय नहीं कर सकते। संविधान पीठ ने चिंता जताई कि इस नियम का उपयोग कुछ विधायक केवल अध्यक्ष को नोटिस देकर अयोग्यता प्रक्रिया रोकने के लिए कर सकते हैं।
पाँच सदस्यीय पीठ ने इस प्रश्न को सात न्यायाधीशों की बड़ी पीठ के पुनर्विचार के लिए भेजा। उसने महाराष्ट्र विवाद में केवल इसी आधार पर उपाध्यक्ष को स्थायी रूप से अयोग्यता सुनवाई से नहीं रोका। यह संदर्भ भविष्य की विधानसभाओं में अध्यक्ष की निष्पक्षता और दलबदल प्रक्रिया—दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
निर्णय का स्थायी महत्व तत्काल सरकार से अधिक संस्थागत सीमाओं में है। राज्यपाल राजनीतिक दल के आंतरिक संघर्ष का निर्णायक नहीं; व्हिप विधायक बहुमत नहीं बल्कि राजनीतिक दल नियुक्त करता है; अध्यक्ष को दल की पहचान की वास्तविक जाँच करनी होती है; और निर्वाचन आयोग तथा अध्यक्ष अलग प्रश्न तय करते हैं। लेकिन संवैधानिक गलती का उपचार पक्षकार के अपने कदमों से प्रभावित होता है—उद्धव ठाकरे का इस्तीफा इसी कारण निर्णायक बन गया।