सदन में गंभीर हिंसा हुई
सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्य आमने-सामने आए, हाथापाई हुई, वस्तुएँ फेंकी गईं और विधायकों तथा सुरक्षाकर्मियों को चोटें आईं। सदन की सामान्य कार्यवाही बाधित हुई।
यह डॉसियर 16 दिसंबर 1993 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में हुई हिंसक झड़प का उपलब्ध सार्वजनिक रिकॉर्ड के आधार पर पुनर्निर्माण करता है। उद्देश्य किसी पक्ष को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि प्रमाणित तथ्य, राजनीतिक आरोप और अभिलेखीय सीमाएँ अलग-अलग दर्ज करना है।
समयरेखा त्वरित अवलोकन देती है। नीचे पाँच विस्तारपूर्ण अध्यायों में राजनीतिक पृष्ठभूमि, घटनाक्रम, अभिलेखीय सीमाएँ, 1997 का पूरक अध्ययन और संसदीय निष्कर्ष व्यवस्थित किए गए हैं।
तीन दशक पुरानी घटना पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध सामग्री सीमित है। इसलिए घटनाक्रम को आधिकारिक समय-सारिणी, निर्वाचन आँकड़ों, समकालीन समाचार-विवरण और बाद के संसदीय उल्लेखों को मिलाकर पढ़ा गया है। सोशल मीडिया वीडियो या किसी दल के बयान को स्वतंत्र पुष्टि के बिना ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना गया।
सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्य आमने-सामने आए, हाथापाई हुई, वस्तुएँ फेंकी गईं और विधायकों तथा सुरक्षाकर्मियों को चोटें आईं। सदन की सामान्य कार्यवाही बाधित हुई।
भाजपा ने सत्ता पक्ष पर संगठित हमले का आरोप लगाया; संसदीय कार्य मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा ने विपक्ष की ओर से पहले जूता फेंके जाने का दावा किया। सार्वजनिक रिकॉर्ड किसी एक दावे को अंतिम रूप से सिद्ध नहीं करता।
कुर्सियाँ और माइक फेंकते विधायकों का व्यापक रूप से साझा वीडियो 21 अक्टूबर 1997 के विश्वासमत के दौरान हुई झड़प का है। उसे 1993 की घटना का दृश्य-साक्ष्य मानना गलत है।
6 दिसंबर 1992 के बाद उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाया गया, जो आधिकारिक विधानसभा रिकॉर्ड के अनुसार 4 दिसंबर 1993 तक रहा। नवंबर 1993 के चुनाव में भाजपा 177 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी, पर बहुमत से दूर रही। समाजवादी पार्टी ने 109 और बहुजन समाज पार्टी ने 67 सीटें जीतीं। दोनों ने गठबंधन बनाकर कांग्रेस और अन्य समर्थनों के साथ सरकार बनाई।
किसी भी तारीख पर क्लिक करके उसका विस्तृत विवरण पढ़ें।
अयोध्या में विवादित ढाँचा गिरने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार बर्खास्त; विधानसभा भंग और राष्ट्रपति शासन लागू।
बाबरी ढाँचा विध्वंस के बाद उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार बर्खास्त कर दी गई। राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हुआ और अगले विधानसभा चुनाव तक प्रशासन केंद्र के नियंत्रण में रहा। इस घटनाक्रम ने 1993 के चुनाव को गहरे राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण की पृष्ठभूमि दी।
विधानसभा चुनाव में भाजपा सबसे बड़ा दल बनी, पर बहुमत नहीं मिला; सपा–बसपा गठबंधन ने सरकार बनाने का दावा किया।
भाजपा 177 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी, लेकिन बहुमत से दूर रही। समाजवादी पार्टी ने 109 और बहुजन समाज पार्टी ने 67 सीटें जीतीं। दोनों दलों ने कांग्रेस तथा अन्य समर्थनों के साथ सरकार बनाने का दावा पेश किया।
मुलायम सिंह यादव ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
त्रिशंकु जनादेश के बाद सपा–बसपा गठबंधन ने सत्ता संभाली। मुलायम सिंह यादव ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। नई सरकार के सामने राजनीतिक स्थिरता, कानून-व्यवस्था और अयोध्या के बाद बने तनावपूर्ण वातावरण की चुनौतियाँ थीं।
केशरी नाथ त्रिपाठी का विधानसभा अध्यक्ष के रूप में पहला कार्यकाल समाप्त हुआ।
उत्तर प्रदेश विधानसभा की पूर्व-अध्यक्ष सूची के अनुसार केशरी नाथ त्रिपाठी का पहला कार्यकाल 15 दिसंबर 1993 को समाप्त हुआ। इसलिए अगले दिन की हिंसा में उनका उल्लेख तत्कालीन अध्यक्ष नहीं, बल्कि पूर्व अध्यक्ष और घायल विधायक के रूप में किया जाना चाहिए।
राज्यपाल के अभिभाषण के बाद सदन में नारेबाज़ी, वेल में विरोध और फिर सत्ता–विपक्ष के सदस्यों के बीच हिंसक झड़प।
समकालीन विवरण के अनुसार भाजपा सदस्य नारे लगाते हुए वेल में पहुँचे। अध्यक्ष धनीराम वर्मा ने तनाव बढ़ने पर कार्यवाही स्थगित की। इसके बाद सत्ता और विपक्ष के सदस्य आमने-सामने आए; हाथापाई हुई और जूते, माइक/स्टैंड तथा अन्य वस्तुएँ फेंके जाने की सूचना मिली। तीन दर्जन से अधिक विधायकों और कई सुरक्षाकर्मियों के घायल होने का उल्लेख मिलता है, हालांकि सटीक संख्या स्रोतों में अलग-अलग है।
विश्वासमत के दौरान विधानसभा में अलग हिंसक घटना; आज वायरल होने वाला कुर्सियाँ–माइक फेंकने का वीडियो इसी दिन का है।
कल्याण सिंह सरकार के विश्वासमत के दौरान सदन में हुई यह अलग हिंसक घटना कैमरे में रिकॉर्ड हुई थी। सोशल मीडिया पर कुर्सियाँ और माइक फेंकते विधायकों का यही वीडियो कई बार 1993 की घटना बताकर साझा किया जाता है। तथ्य-जाँच के अनुसार दोनों घटनाओं को एक मानना गलत है।
24 दिसंबर 1993 को प्रकाशित एक समकालीन समाचार-विवरण के अनुसार, राज्यपाल के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करने के बाद सदन लगभग 12:30 बजे फिर बैठा। भाजपा सदस्य “कल्याण नहीं तो सदन नहीं” का नारा लगाते हुए वेल में पहुँचे। अध्यक्ष धनीराम वर्मा ने तनाव देखकर कार्यवाही स्थगित की और चले गए। इसके बाद दोनों ओर से वस्तुएँ फेंके जाने और हाथापाई की स्थिति बनी।
नई सपा–बसपा सरकार के विरुद्ध भाजपा का तीखा विरोध सदन के भीतर नारेबाज़ी और वेल तक पहुँचा।
अध्यक्ष धनीराम वर्मा ने स्थिति बिगड़ती देखकर सदन स्थगित किया। स्थगन के बाद की घटनाओं पर स्रोतों में कुछ विवरणात्मक अंतर हैं।
समकालीन विवरण जूते, माइक/स्टैंड और अन्य वस्तुएँ फेंके जाने तथा दोनों पक्षों के बीच शारीरिक टकराव का उल्लेख करता है।
रिपोर्ट में तीन दर्जन से अधिक विधायकों और लगभग आधा दर्जन सुरक्षा कर्मियों के घायल होने का उल्लेख है। अलग स्रोतों में संख्या बदलती है, इसलिए इसे अनुमानित माना गया है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा की आधिकारिक पूर्व-अध्यक्ष सूची के अनुसार केशरी नाथ त्रिपाठी का पहला अध्यक्षीय कार्यकाल 30 जुलाई 1991 से 15 दिसंबर 1993 तक था। 16 दिसंबर की समकालीन रिपोर्ट धनीराम वर्मा को अध्यक्ष बताती है और त्रिपाठी तथा हरिकृष्ण श्रीवास्तव को घायल पूर्व अध्यक्षों के रूप में दर्ज करती है। इसलिए घटना का सही वर्णन है: पूर्व अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी घायल हुए; सदन की अध्यक्षता धनीराम वर्मा कर रहे थे।
दोनों अवसरों पर सदन में हिंसा हुई, लेकिन उनकी राजनीतिक और संवैधानिक पृष्ठभूमि भिन्न थी।
सपा–बसपा सरकार के आरंभिक दिनों में सत्ता–विपक्ष टकराव; राज्यपाल के अभिभाषण के बाद अव्यवस्था और हिंसा। उपलब्ध दृश्य-साक्ष्य सीमित।
कल्याण सिंह सरकार के बहुमत परीक्षण के दौरान कुर्सियाँ, माइक और अन्य वस्तुएँ फेंकी गईं। वायरल वीडियो इसी घटना का है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा की 16 दिसंबर 1993 की कार्यवाही, समकालीन समाचार-पत्रों के मूल पृष्ठ, घायलों का आधिकारिक विवरण, सुरक्षा रिपोर्ट और किसी विशेषाधिकार अथवा जाँच संबंधी दस्तावेज़ मिलने पर डॉसियर का विस्तृत संस्करण प्रकाशित किया जाएगा।