हिंसा को एक दिन की आकस्मिक घटना मानना पर्याप्त नहीं
16 दिसंबर 1993 की झड़प ऐसे समय हुई जब उत्तर प्रदेश की राजनीति अयोध्या आंदोलन, सरकार की बर्खास्तगी, लगभग एक वर्ष के राष्ट्रपति शासन और सामाजिक गठबंधनों के पुनर्गठन से गुजर रही थी। 6 दिसंबर 1992 को विवादित ढाँचा गिरने के बाद राज्य सरकार बर्खास्त हुई। उत्तर प्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार राष्ट्रपति शासन 6 दिसंबर 1992 से 4 दिसंबर 1993 तक रहा और विधानसभा भंग थी।
1993 का जनादेश: सबसे बड़ा दल, पर स्पष्ट बहुमत नहीं
नवंबर 1993 के चुनाव में भाजपा 177 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बनी, लेकिन 425 सदस्यीय सदन में बहुमत से दूर रही। समाजवादी पार्टी ने 109 और बहुजन समाज पार्टी ने 67 सीटें जीतीं। चुनाव परिणाम ने यह स्पष्ट किया कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा केवल दलों के बीच नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक आधारों और अयोध्या के बाद बने वैचारिक ध्रुवों के बीच भी थी।
सपा और बसपा का साथ उस समय एक असाधारण राजनीतिक प्रयोग था। दोनों दलों की संगठनात्मक संस्कृति और नेतृत्व शैली अलग थी, फिर भी उन्होंने भाजपा को सत्ता से बाहर रखने के साझा उद्देश्य से गठबंधन बनाया। कांग्रेस और कुछ अन्य समूहों के समर्थन से सरकार गठन का रास्ता बना और 4 दिसंबर 1993 को मुलायम सिंह यादव ने दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।
नई सरकार के सामने तात्कालिक चुनौतियाँ
सरकार को बहुमत बनाए रखने के साथ-साथ सांप्रदायिक तनाव, कानून-व्यवस्था, प्रशासनिक पुनर्संयोजन और गठबंधन के भीतर विश्वास कायम रखने की चुनौती थी। विपक्ष के लिए चुनाव में सबसे बड़ा दल बनने के बावजूद सत्ता से बाहर रहना राजनीतिक असंतोष का कारण था। यही तनाव विधानसभा के शुरुआती सत्र में तीखे विरोध के रूप में सामने आया।
15–16 दिसंबर का प्रथम सत्र
नई विधानसभा का शुरुआती अधिवेशन सामान्य विधायी कार्यवाही से अधिक राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का मंच बन गया। विपक्ष नई सरकार की वैधता और राजनीतिक दिशा पर आक्रामक था; सत्ता पक्ष इसे चुनावोत्तर गठबंधन के जनादेश के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। राज्यपाल के अभिभाषण के आसपास नारेबाज़ी और वेल में विरोध ने पहले से मौजूद तनाव को प्रत्यक्ष टकराव में बदलने की परिस्थिति बनाई।