1940–1945: युद्धकालीन राजनीति
अगस्त प्रस्ताव, क्रिप्स मिशन, भारत छोड़ो आंदोलन और लीग के विस्तार का निर्णायक दौर
द्वितीय विश्वयुद्ध ने भारत के संवैधानिक प्रश्न को साम्राज्य की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय दबाव और घरेलू वैधता से जोड़ दिया। इसी काल में कांग्रेस के जन-प्रतिरोध और मुस्लिम लीग के संगठनात्मक विस्तार ने अंतिम सत्ता-संघर्ष की जमीन तैयार की।
अगस्त प्रस्ताव
वायसराय लिनलिथगो ने युद्ध के बाद नया संवैधानिक ढाँचा, कार्यकारिणी परिषद का विस्तार और प्रमुख समूहों की सहमति के बिना संविधान न थोपने का आश्वासन दिया।
कांग्रेस ने तत्काल उत्तरदायी सरकार के अभाव में प्रस्ताव ठुकराया। लीग ने ‘सहमति’ के सिद्धांत में अपने वीटो-समान राजनीतिक महत्व की मान्यता देखी।
अगस्त प्रस्ताव गतिरोध नहीं तोड़ सका, पर ब्रिटिश नीति में कांग्रेस के अतिरिक्त अन्य पक्षों की सहमति को औपचारिक महत्व मिला।
व्यक्तिगत सत्याग्रह
गांधी ने व्यापक विद्रोह के बजाय नियंत्रित, अहिंसक व्यक्तिगत सत्याग्रह चुना। विनोबा भावे पहले और जवाहरलाल नेहरू दूसरे प्रमुख सत्याग्रही बने।
आंदोलन ने भारतीय सहमति के बिना युद्ध में भागीदारी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को केंद्रीय प्रश्न बनाया। हजारों कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए, किंतु तत्काल संवैधानिक समाधान नहीं निकला।
व्यक्तिगत सत्याग्रह युद्ध-विरोधी राजनीतिक अधिकार का प्रदर्शन था, सत्ता हस्तांतरण का तात्कालिक अभियान नहीं।
जापानी खतरा और क्रिप्स मिशन
पर्ल हार्बर के बाद जापान ने मलाया, सिंगापुर और बर्मा पर कब्ज़ा किया; भारत मित्र राष्ट्रों का अग्रिम सैन्य एवं रसद केंद्र बन गया। ब्रिटेन पर भारतीय सहयोग पाने का दबाव बढ़ा।
मार्च 1942 के क्रिप्स प्रस्तावों ने युद्धोत्तर डोमिनियन स्टेटस, संविधान सभा और प्रांतों को संघ से बाहर रहने का विकल्प दिया, पर युद्धकालीन रक्षा ब्रिटिश नियंत्रण में रखी। कांग्रेस ने तत्काल सत्ता के अभाव और लीग ने स्पष्ट पाकिस्तान न मिलने के कारण प्रस्ताव अस्वीकार किए।
क्रिप्स मिशन ने विभाजन-संभावना वाले प्रांतीय विकल्प को संवैधानिक भाषा दी, लेकिन किसी प्रमुख पक्ष को संतुष्ट नहीं कर सका।
भारत छोड़ो आंदोलन
8 अगस्त 1942 को बंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया और गांधी ने ‘करो या मरो’ का आह्वान किया। 9 अगस्त की सुबह गांधी, नेहरू, पटेल, आज़ाद और अन्य शीर्ष नेता गिरफ्तार कर लिए गए।
केंद्रीय नेतृत्व अनुपस्थित होने पर आंदोलन अनेक क्षेत्रों में स्वतःस्फूर्त और अलग-अलग रूपों में चला। हड़तालों तथा संचार-विरोधी कार्रवाइयों के साथ बलिया, तमलुक की ताम्रलिप्त जातीय सरकार और सतारा की प्रति सरकार जैसे समानांतर प्रशासन के प्रयोग भी उभरे।
ब्रिटिश दमन में व्यापक गिरफ्तारियाँ, गोलीबारी और सेंसरशिप शामिल थीं। मुस्लिम लीग, हिंदू महासभा, कम्युनिस्ट पार्टी और अनेक रियासती शक्तियों ने आंदोलन का समर्थन नहीं किया—हालाँकि उनके कारण एक समान नहीं थे। कांग्रेस नेतृत्व के कारावास के दौरान लीग ने पाकिस्तान अभियान और संगठन का विस्तार किया।
आंदोलन तत्काल स्वतंत्रता नहीं ला सका, पर उसने औपनिवेशिक शासन की दीर्घकालिक वैधता और व्यावहारिकता पर निर्णायक प्रश्न खड़ा किया।
मुस्लिम लीग का विस्तार
लीग ने लाहौर प्रस्ताव को आधार बनाकर मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों और अन्य प्रांतों में सदस्यता, सम्मेलन और प्रचार बढ़ाया। कांग्रेस नेतृत्व जेल में था और ब्रिटिश वार्ताओं में लीग को स्वतंत्र प्रमुख पक्ष माना जाने लगा।
इस संगठनात्मक विस्तार ने 1945–46 के चुनावों में मुस्लिम आरक्षित सीटों पर लीग की सफलता का आधार तैयार किया।
1942–45 ने पाकिस्तान की मांग को विचार से चुनावी जनादेश की दिशा में पहुँचाया।
गांधी–जिन्ना वार्ता और शिमला सम्मेलन
9 से 27 सितंबर 1944 के बीच बंबई में गांधी–जिन्ना वार्ताएँ सी. राजगोपालाचारी फ़ॉर्मूले की पृष्ठभूमि में हुईं। फ़ॉर्मूले ने स्वतंत्रता के बाद संलग्न मुस्लिम-बहुल जिलों में जनमत-संग्रह और पृथक्करण की स्थिति में रक्षा, संचार तथा वाणिज्य पर समझौते का सुझाव दिया था।
गांधी विभाजन को दो राष्ट्रों के बीच नहीं, एक परिवार के भीतर संभावित पृथक्करण के रूप में देखते थे और स्वतंत्रता को पहले रखना चाहते थे। जिन्ना चाहते थे कि कांग्रेस पाकिस्तान के सिद्धांत और लीग के प्रतिनिधित्व को पहले स्वीकार करे। सीमा, जनमत-संग्रह की इकाई और संप्रभुता पर सहमति नहीं बनी।
25 जून से 14 जुलाई 1945 के शिमला सम्मेलन में वेवल योजना के अंतर्गत कार्यकारिणी परिषद का पुनर्गठन प्रस्तावित था। सभी मुस्लिम सदस्यों को नामित करने के लीग के दावे और कांग्रेस के सर्वभारतीय प्रतिनिधित्व के दावे में टकराव से सम्मेलन विफल हुआ।
दोनों प्रयासों की विफलता ने प्रतिनिधित्व को भारत की संवैधानिक समस्या के केंद्र में स्थापित कर दिया।
युद्ध ने ब्रिटेन की क्षमता कमजोर की, पर भारतीय पक्षों के बीच साझा समाधान स्वतः उत्पन्न नहीं किया। कांग्रेस का दमन और लीग का विस्तार, असफल वार्ताएँ और प्रतिनिधित्व पर टकराव—इन सबने 1945 तक एक ऐसे राजनीतिक परिदृश्य को जन्म दिया जिसमें सत्ता हस्तांतरण के लिए दोनों प्रमुख दलों की सहमति अनिवार्य, किंतु अत्यंत कठिन थी।