1945–1947: स्वतंत्रता का अंतिम चरण
चुनावी जनादेश से कैबिनेट मिशन, प्रत्यक्ष कार्रवाई, माउंटबेटन योजना और दो राष्ट्रों के जन्म तक
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद दो वर्षों से कम समय में चुनाव, संवैधानिक वार्ता, अंतरिम शासन, सांप्रदायिक हिंसा, सीमा-निर्धारण और सत्ता हस्तांतरण एक-दूसरे पर चढ़ते गए। यही तीव्रता स्वतंत्रता और विभाजन—दोनों को समझने की कुंजी है।
केंद्रीय और प्रांतीय चुनाव
1945 के केंद्रीय विधानमंडल चुनाव में कांग्रेस ने सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों का बड़ा बहुमत और मुस्लिम लीग ने सभी 30 मुस्लिम आरक्षित सीटें जीतीं। 1946 के प्रांतीय चुनावों में कांग्रेस 1,585 में से लगभग 923 सीटों के साथ सबसे बड़ी शक्ति बनी; विभिन्न आधिकारिक/समकालीन संकलनों में सूक्ष्म अंतर के कारण आँकड़ों को स्रोत सहित पढ़ना चाहिए।
लीग ने प्रांतीय मुस्लिम आरक्षित सीटों का लगभग 87 प्रतिशत—सामान्यतः 492 में 429—जीता। फिर भी उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में कांग्रेस और पंजाब में यूनियनिस्ट, अकाली तथा कांग्रेस की उपस्थिति बताती है कि मुस्लिम राजनीति पूरी तरह एकरूप नहीं थी।
लीग ने परिणाम को पाकिस्तान की मांग और मुसलमानों के प्रमुख प्रतिनिधित्व का जनादेश कहा; कांग्रेस ने स्वयं को अखिल भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य शक्ति माना। सीमित संपत्ति-आधारित मताधिकार के कारण ये सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार वाले चुनाव नहीं थे।
चुनावों ने कांग्रेस और लीग को दो प्रमुख वार्ताकार बनाया, लेकिन उन्हें पूरे वयस्क जनसमुदाय का प्रत्यक्ष जनमत-संग्रह नहीं माना जा सकता।
कैबिनेट मिशन और संयुक्त भारत का अंतिम बड़ा विकल्प
लॉर्ड पेथिक-लॉरेंस, सर स्टैफर्ड क्रिप्स और ए. वी. अलेक्ज़ेंडर का मिशन 24 मार्च 1946 को भारत पहुँचा। 16 मई की योजना ने रक्षा, विदेश नीति और संचार—तथा इनके लिए आवश्यक वित्त—तक सीमित संघ; व्यापक प्रांतीय शक्तियाँ; संविधान सभा और अंतरिम सरकार प्रस्तावित की।
प्रांत तीन अनुभागों में रखे गए: A में मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत और उड़ीसा; B में पंजाब, NWFP और सिंध; C में बंगाल और असम। प्रत्येक अनुभाग अपने समूह-संविधान और साझा प्रांतीय विषय तय कर सकता था; नई संवैधानिक व्यवस्था लागू होने के बाद प्रांत को पुनर्विचार का अवसर मिलना था।
कांग्रेस समूहों को स्थायी अथवा प्रांतों की इच्छा के विरुद्ध बाध्यकारी मानने से इंकार करती थी और केंद्र को अधिक सक्षम देखना चाहती थी। लीग अनिवार्य प्रारंभिक समूह-व्यवस्था को मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों की सामूहिक सुरक्षा मानती थी। जुलाई 1946 में व्याख्यात्मक मतभेद और अविश्वास बढ़े; लीग ने स्वीकृति वापस ली।
कैबिनेट मिशन भारत को विभाजित किए बिना सत्ता हस्तांतरण का अंतिम व्यापक ब्रिटिश प्रयास था।
अंतरिम सरकार और प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस
2 सितंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू की उपाध्यक्षता में अंतरिम सरकार बनी। लीग अक्टूबर में शामिल हुई और लियाक़त अली ख़ान को वित्त विभाग मिला, पर मंत्रिमंडल के भीतर सहयोग के बजाय लगातार अवरोध और अविश्वास रहा।
लीग ने 16 अगस्त को पाकिस्तान के समर्थन में प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस घोषित किया। कलकत्ता की हिंसा कई दिनों तक चली और हजारों लोग मारे गए। इसके बाद नोआखाली, बिहार, गढ़मुक्तेश्वर, रावलपिंडी और पंजाब में प्रतिशोध और सांप्रदायिक हिंसा की शृंखला फैल गई।
प्रत्यक्ष कार्रवाई और उसके बाद की हिंसा ने संवैधानिक मतभेद को व्यापक सामाजिक-सुरक्षा संकट में बदल दिया।
संविधान सभा, हिंसा और एटली की समय-सीमा
संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को हुई; मुस्लिम लीग ने उसका बहिष्कार किया। 11 दिसंबर को डॉ. राजेंद्र प्रसाद स्थायी अध्यक्ष बने। इसी समय बंगाल, बिहार और पंजाब में हिंसा तथा प्रशासनिक विघटन गहराता गया।
20 फरवरी 1947 को प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की घोषणा की और वेवल के स्थान पर माउंटबेटन की नियुक्ति बताई। साझा संविधान न बनने की स्थिति में उपलब्ध परिस्थितियों के अनुसार सत्ता सौंपने की चेतावनी ने अंतिम समय-सीमा निर्धारित कर दी।
एटली की घोषणा ने स्वतंत्रता को मांग से निश्चित प्रशासनिक कार्यक्रम में बदल दिया।
माउंटबेटन, 3 जून योजना और स्वतंत्रता अधिनियम
माउंटबेटन ने 24 मार्च को पदभार संभालकर गांधी, नेहरू, पटेल, जिन्ना, आज़ाद और सिख नेतृत्व से वार्ता की। बढ़ती हिंसा और राजनीतिक गतिरोध के बीच उन्होंने जून 1948 की सीमा की प्रतीक्षा न कर शीघ्र सत्ता हस्तांतरण चुना।
3 जून योजना ने पंजाब और बंगाल के विभाजन, NWFP और सिलहट में जनमत-संग्रह तथा दो डोमिनियन का मार्ग दिया। कांग्रेस, लीग और सिख प्रतिनिधियों की स्वीकृति के बाद ब्रिटिश संसद ने 18 जुलाई को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम पारित किया, जिसने ब्रिटिश विधायी सर्वोच्चता और रियासतों पर परमाउंटसी समाप्त की।
कानूनी सत्ता हस्तांतरण और भौगोलिक विभाजन एक अत्यंत संक्षिप्त प्रशासनिक समय-सारणी में साथ-साथ लागू हुए।
रैडक्लिफ़ सीमा आयोग
पंजाब और बंगाल के लिए अलग आयोगों की अध्यक्षता सर सिरिल रैडक्लिफ़ ने की, जो इससे पहले भारत नहीं आए थे। दोनों आयोगों में कांग्रेस और लीग द्वारा नामित न्यायाधीश थे; बराबर मत-विभाजन की स्थिति में अंतिम निर्णय अध्यक्ष पर आ गया।
आयोग को मुस्लिम और गैर-मुस्लिम बहुलता के साथ ‘अन्य कारकों’—संचार, सिंचाई, प्रशासनिक निरंतरता और आर्थिक संबंध—पर विचार करना था। लगभग पाँच सप्ताह में जनगणना-आधारित नक्शों और सीमित सुनवाई के सहारे जटिल सीमा तय की गई।
बंगाल और पंजाब पुरस्कार क्रमशः 9 और 12 अगस्त तक अंतिम रूप में तैयार थे, लेकिन आधिकारिक प्रकाशन 17 अगस्त—दोनों देशों की स्वतंत्रता के बाद—हुआ। अनिश्चितता, प्रशासनिक तैयारी की कमी और जन-प्रवास ने सीमावर्ती संकट को गंभीर बनाया।
सीमा का विलंबित प्रकाशन विभाजन की अव्यवस्था का प्रतीक बना, हालांकि हिंसा के कारण इससे कहीं व्यापक थे।
स्वतंत्रता, विस्थापन और क्या विभाजन टल सकता था?
14 अगस्त को पाकिस्तान और 15 अगस्त को भारत स्वतंत्र डोमिनियन बने। जिन्ना पाकिस्तान के गवर्नर-जनरल, लियाक़त प्रधानमंत्री; माउंटबेटन भारत के गवर्नर-जनरल और नेहरू प्रधानमंत्री बने। स्वतंत्रता का उत्सव पंजाब और बंगाल में हिंसा, भय और पलायन से घिरा था।
इतिहासकारों का एक पक्ष कैबिनेट मिशन जैसे शक्ति-साझेदारी विकल्पों में विभाजन टालने की संभावना देखता है। दूसरा 1946–47 के जनादेश, पाकिस्तान की मांग, मजबूत केंद्र पर कांग्रेस का आग्रह, हिंसा और ब्रिटिश जल्दबाजी के कारण इसे लगभग अपरिहार्य मानता है।
विभाजन न तो एक क्षण में तय हुआ, न किसी एक व्यक्ति का निर्णय था; अंतिम चरण में विकल्प तेजी से संकुचित होते गए।
कैबिनेट मिशन की विफलता के बाद संयुक्त भारत के संवैधानिक विकल्प तेजी से कमजोर हुए। फिर भी विभाजन की स्वीकृति और उसे लागू करने की गति अलग प्रश्न हैं। निर्णय की राजनीतिक विवशताओं के साथ प्रशासनिक तैयारी, सीमा प्रकाशन और नागरिक सुरक्षा की विफलताओं का स्वतंत्र मूल्यांकन आवश्यक है।