1937–1940: नई राजनीतिक दिशा
चुनाव, शासन, युद्ध और लाहौर प्रस्ताव से बदलती कांग्रेस–मुस्लिम लीग राजनीति
चार वर्षों में भारतीय राजनीति का शक्ति-संतुलन तेजी से बदला। कांग्रेस ने शासन चलाया, मुस्लिम लीग ने अपना संगठन पुनर्निर्मित किया और युद्धकालीन संकट ने दोनों के संबंधों को नए स्तर पर पहुँचा दिया।
प्रांतीय चुनाव और नया शक्ति-संतुलन
भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अंतर्गत हुए चुनावों में कांग्रेस ने सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों और अनेक प्रांतों में बड़ी सफलता प्राप्त की। मुस्लिम लीग को, विशेषकर मुस्लिम-बहुल प्रांतों में, अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
इन परिणामों ने कांग्रेस के अखिल भारतीय प्रतिनिधित्व के दावे को बल दिया, लेकिन लीग के सामने संगठन के पुनर्निर्माण की चुनौती रखी। चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश में सत्ता-साझेदारी पर असहमति को दोनों दलों की बढ़ती दूरी के महत्वपूर्ण प्रसंगों में गिना जाता है।
1937 का जनादेश अंतिम नहीं था; उसने कांग्रेस को शासन और जिन्ना को लीग के व्यापक पुनर्गठन की दिशा दी।
कांग्रेस मंत्रिमंडल और शासन का अनुभव
गवर्नरों की विशेष शक्तियों पर आश्वासन मिलने के बाद कांग्रेस ने जुलाई 1937 से मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत, बिहार, मध्य प्रांत एवं बरार और उड़ीसा में मंत्रिमंडल बनाए; उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में डॉ. ख़ान साहब का मंत्रिमंडल बाद में उसी वर्ष और असम में गोपीनाथ बोरदोलोई का मंत्रिमंडल 1938 में बना।
सरकारों ने नागरिक स्वतंत्रताओं की बहाली, राजनीतिक बंदियों की रिहाई, प्राथमिक शिक्षा, किसान-ऋण और काश्तकारी प्रश्नों पर अलग-अलग सीमा तक पहल की। पर रक्षा, पुलिस के कुछ पहलुओं और संवैधानिक संकट में गवर्नरों के आरक्षित अधिकारों ने स्वायत्तता सीमित रखी।
मुस्लिम लीग ने पीरपुर रिपोर्ट और अन्य दस्तावेज़ों के माध्यम से कांग्रेस शासन में मुस्लिम हितों की उपेक्षा के आरोप लगाए। कांग्रेस ने आरोपों को पक्षपाती बताते हुए स्वयं को सभी नागरिकों का दल कहा। इन परस्पर दावों को सिद्ध तथ्य मानने के बजाय समकालीन राजनीतिक अभियान के रूप में स्रोत-समीक्षा के साथ पढ़ना आवश्यक है।
कांग्रेस मंत्रिमंडल प्रशासनिक प्रयोग भी थे और कांग्रेस–लीग वैधता-संघर्ष का मैदान भी।
मुस्लिम लीग का पुनर्गठन और जिन्ना का नेतृत्व
1937 के बाद जिन्ना ने सदस्यता अभियान, प्रांतीय गठबंधनों और अखिल भारतीय प्रचार के जरिए लीग को अभिजात संगठन से जन-राजनीतिक मंच में बदलने का प्रयास किया।
उन्होंने कांग्रेस के सर्वप्रतिनिधि दावे को चुनौती देते हुए मुसलमानों को विशिष्ट राजनीतिक समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया। 1937–40 के बीच यही रणनीति लीग को लाहौर प्रस्ताव की स्थिति तक ले गई।
लीग का विस्तार केवल वैचारिक परिवर्तन नहीं, सुनियोजित संगठनात्मक पुनर्निर्माण भी था।
द्वितीय विश्वयुद्ध और कांग्रेस मंत्रिमंडलों का इस्तीफ़ा
3 सितंबर 1939 को वायसराय लिनलिथगो ने भारतीय नेतृत्व से परामर्श किए बिना भारत को युद्धरत घोषित किया। कांग्रेस ने स्वतंत्रता या उत्तरदायी राष्ट्रीय सरकार का स्पष्ट आश्वासन माँगा; असफल रहने पर अक्टूबर–नवंबर में उसके मंत्रिमंडलों ने इस्तीफ़ा दे दिया।
मुस्लिम लीग ने 22 दिसंबर 1939 को ‘मुक्ति दिवस’ मनाया। कांग्रेस ने इसकी आलोचना की, जबकि लीग ने इसे कांग्रेस शासन से मुक्ति कहा। युद्ध ने ब्रिटिश सरकार, कांग्रेस और लीग के त्रिकोणीय संबंधों को नया मोड़ दिया।
इस्तीफ़ों से प्रांतीय सत्ता का खाली स्थान बना और लीग को अपना जनाधार बढ़ाने का अवसर मिला।
लाहौर प्रस्ताव और पाकिस्तान की अवधारणा
लाहौर के मिंटो पार्क में ए. के. फ़ज़लुल हक़ द्वारा प्रस्तुत और 23 मार्च को स्वीकृत प्रस्ताव ने उत्तर-पश्चिमी तथा पूर्वी भारत के भौगोलिक रूप से संलग्न मुस्लिम-बहुल क्षेत्रों को ऐसी ‘स्वतंत्र राज्यों’ की इकाइयों में संगठित करने की बात कही, जिनकी घटक इकाइयाँ स्वायत्त और संप्रभु हों।
प्रस्ताव में ‘Pakistan’ शब्द नहीं था, एकवचन अथवा बहुवचन राज्य की भावी व्याख्या तत्काल पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी और सीमाएँ भी निर्धारित नहीं थीं। 1946 में लीग ने इसकी आधिकारिक व्याख्या एक संप्रभु पाकिस्तान की मांग के रूप में दृढ़ की।
जिन्ना के अध्यक्षीय भाषण ने हिंदू और मुसलमानों को अलग ऐतिहासिक-सामाजिक राष्ट्रों के रूप में प्रस्तुत किया। कांग्रेस ने इस दृष्टिकोण को अस्वीकार कर संयुक्त भारतीय राष्ट्रवाद का समर्थन जारी रखा।
लाहौर प्रस्ताव तत्काल नक्शा नहीं था, लेकिन उसने संवैधानिक सुरक्षा की मांग को पृथक राजनीतिक व्यवस्था की दिशा में निर्णायक रूप दिया।
1937–40 को साझा राष्ट्रवाद से सीधे विभाजन की रेखा मानना सरलीकरण होगा, पर इसी काल में प्रतिनिधित्व का विवाद वैकल्पिक राष्ट्र-कल्पनाओं में बदल गया। कांग्रेस मंत्रिमंडल, लीग का पुनर्गठन और युद्ध के समय ब्रिटिश निर्णय लाहौर प्रस्ताव के लिए निर्णायक पृष्ठभूमि बने।