omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–006 · भाग 01

1905–1935: प्रारंभिक पृष्ठभूमि

बंगाल विभाजन से भारत सरकार अधिनियम तक—राष्ट्रवाद, प्रतिनिधित्व और संघीय प्रयोगों का विकास

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंस्करण 1.0 · 20 जुलाई 2026

विभाजन की जड़ें 1940 के दशक की घटनाओं से पहले निर्मित संवैधानिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं में थीं। इस भाग में उन संस्थागत विकल्पों को देखा गया है जिन्होंने समुदाय, नागरिकता और प्रतिनिधित्व के प्रश्न को भारतीय राजनीति के केंद्र में रखा।

1.1 · 1905–1911

बंगाल विभाजन और स्वदेशी आंदोलन

16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी कर्ज़न योजना ने पूर्वी बंगाल और असम का नया प्रांत बनाया; शेष बंगाल प्रशासन में पश्चिमी बंगाल के साथ बिहार और उड़ीसा भी जुड़े रहे। प्रशासनिक सुविधा आधिकारिक तर्क था, पर राष्ट्रवादी नेतृत्व ने इसे बंगाली राजनीतिक शक्ति को बाँटने वाली ‘फूट डालो और शासन करो’ नीति माना।

विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी उद्योग, राष्ट्रीय शिक्षा और सार्वजनिक सभाओं ने आंदोलन को व्यापक जनाधार दिया। तिलक, बिपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय और अरविंद घोष की उग्र राष्ट्रवादी धारा का प्रभाव बढ़ा; 1907 का सूरत विभाजन कांग्रेस के आंतरिक मतभेदों का भी परिणाम था।

12 दिसंबर 1911 के दिल्ली दरबार में विभाजन निरस्त करने और राजधानी कलकत्ता से दिल्ली ले जाने की घोषणा हुई। बिहार–उड़ीसा अलग प्रांत बना और बंगाल का पुनर्गठन हुआ, किंतु 1905 से पैदा राजनीतिक प्रभाव समाप्त नहीं हुए।

मुख्य तथ्य

बंगाल विभाजन ने स्वतंत्रता आंदोलन को जन-आधारित रूप दिया; उसका निरस्तीकरण राजनीतिक प्रभावों को समाप्त नहीं कर सका।

1.2 · 1906

अखिल भारतीय मुस्लिम लीग की स्थापना

अक्टूबर 1906 के शिमला प्रतिनिधिमंडल ने वायसराय मिंटो के समक्ष मुसलमानों के पृथक प्रतिनिधित्व की मांग रखी। 30 दिसंबर 1906 को ढाका में नवाब सलीमुल्लाह की पहल पर मुस्लिम लीग की स्थापना हुई; आगा ख़ाँ, मोहसिन-उल-मुल्क और वकार-उल-मुल्क प्रारंभिक नेतृत्व में थे।

स्थापना के समय लीग का लक्ष्य पाकिस्तान नहीं था। वह ब्रिटिश सरकार के प्रति निष्ठा रखते हुए मुसलमानों के राजनीतिक अधिकार, सरकारी भागीदारी और संवैधानिक सुरक्षा चाहती थी। 1940 के दशक तक पहुँचते-पहुँचते उसका उद्देश्य निर्णायक रूप से बदल गया।

मुख्य तथ्य

1906 की लीग प्रतिनिधित्व का संगठन थी; पृथक राष्ट्र की औपचारिक मांग बहुत बाद में उभरी।

1.3 · 1909

मॉर्ले–मिंटो सुधार और पृथक निर्वाचन

भारतीय परिषद अधिनियम, 1909 ने विधायी परिषदों का विस्तार किया, लेकिन कार्यपालिका पर ब्रिटिश नियंत्रण बनाए रखा। इसकी सबसे दूरगामी व्यवस्था मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन थी, जिसमें मुस्लिम मतदाता अलग निर्वाचन क्षेत्रों में मुस्लिम उम्मीदवार चुनते थे।

ब्रिटिश सरकार ने इसे अल्पसंख्यक सुरक्षा कहा; कांग्रेस के अनेक नेताओं ने इसे धार्मिक आधार पर राजनीतिक विभाजन का संस्थानीकरण माना। आगे लखनऊ समझौता, सांप्रदायिक निर्णय और अन्य संवैधानिक वार्ताएँ इसी प्रश्न से प्रभावित हुईं।

मुख्य तथ्य

1909 ने धार्मिक पहचान को पहली बार औपचारिक निर्वाचन-व्यवस्था का आधार बनाया।

1.4–1.5 · 1916–1924

लखनऊ समझौता, खिलाफत और असहयोग

1916 का लखनऊ समझौता कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सहयोग का सर्वोच्च चरण था। कांग्रेस ने पृथक निर्वाचन और कुछ प्रांतों में मुस्लिम प्रतिनिधित्व के लिए वेटेज स्वीकार किया; लीग ने संवैधानिक सुधारों की संयुक्त मांग पर सहमति दी।

प्रथम विश्वयुद्ध के बाद खिलाफत आंदोलन को गांधी ने असहयोग आंदोलन से जोड़ा। इस गठबंधन ने राष्ट्रीय आंदोलन को अभूतपूर्व जनाधार दिया, पर 1922 में असहयोग की वापसी और 1924 में खिलाफत संस्था के अंत के बाद सहयोग कमजोर पड़ा। 1920 के दशक के दंगे और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने अविश्वास बढ़ाया।

मुख्य तथ्य

यह काल सहयोग और तनाव—दोनों का था; इसे केवल एकता या केवल सांप्रदायिकता के रूप में पढ़ना अधूरा होगा।

1.6 · 1928–1929

नेहरू रिपोर्ट और जिन्ना के चौदह सूत्र

मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली नेहरू रिपोर्ट ने डोमिनियन स्टेटस, उत्तरदायी शासन, मौलिक अधिकार और संयुक्त निर्वाचन की सिफारिश की। पृथक निर्वाचन समाप्त करने का प्रस्ताव मुस्लिम लीग के अनेक नेताओं को स्वीकार नहीं था।

1929 में जिन्ना ने चौदह सूत्र प्रस्तुत किए—संघीय संविधान, प्रांतीय स्वायत्तता, पृथक निर्वाचन, उचित प्रतिनिधित्व और अल्पसंख्यक सुरक्षा इनमें केंद्रीय थे। ये भावी संवैधानिक समझौते की न्यूनतम शर्तों के रूप में रखे गए।

मुख्य तथ्य

दोनों दस्तावेज़ संयुक्त नागरिक राष्ट्रवाद और समुदाय-आधारित संवैधानिक सुरक्षा के बीच बढ़ती दूरी के प्रतीक बने।

1.7–1.8 · 1930–1935

गोलमेज सम्मेलन, सांप्रदायिक निर्णय और 1935 का अधिनियम

1930–32 के तीन गोलमेज सम्मेलनों में संघवाद, रियासतें, अल्पसंख्यक अधिकार और प्रतिनिधित्व पर सहमति नहीं बन सकी। कांग्रेस पहले सम्मेलन में अनुपस्थित थी; गांधी ने गांधी–इरविन समझौते के बाद दूसरे सम्मेलन में कांग्रेस का प्रतिनिधित्व किया।

16 अगस्त 1932 के सांप्रदायिक निर्णय ने मुसलमानों, सिखों, ईसाइयों, एंग्लो-इंडियनों, यूरोपियनों और दलित वर्गों के लिए पृथक प्रतिनिधित्व प्रस्तावित किया। गांधी के अनशन और डॉ. बी. आर. आंबेडकर से वार्ता के बाद 24 सितंबर का पूना समझौता हुआ; दलित वर्गों के लिए पृथक निर्वाचन के स्थान पर संयुक्त निर्वाचन में अधिक आरक्षित सीटें तय हुईं।

भारत सरकार अधिनियम, 1935 ने प्रांतीय स्वायत्तता, प्रस्तावित अखिल भारतीय संघ, तीन विधायी सूचियाँ, संघीय न्यायालय और लोक सेवा संस्थाओं का विस्तृत ढाँचा दिया। संघ रियासतों की अपेक्षित भागीदारी न होने से लागू नहीं हुआ; प्रांतीय भाग के आधार पर 1937 के चुनाव हुए और बर्मा को 1937 में भारत से अलग किया गया।

मुख्य तथ्य

1935 का अधिनियम उत्तरदायी शासन नहीं था, फिर भी उसने 1937–47 की राजनीति का संस्थागत मैदान तैयार किया।

OCN ऐतिहासिक आकलन

1905–35 के घटनाक्रम ने विभाजन को अपरिहार्य नहीं बनाया, लेकिन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की भाषा और संस्थाएँ अवश्य गढ़ीं। पृथक निर्वाचन, समुदाय-आधारित प्रतिनिधित्व और असफल संघीय प्रयोग आगे के दशकों में समझौते की संभावनाओं और सीमाओं—दोनों को निर्धारित करते रहे।