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दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–006 · भाग 05

प्रमुख नेता और निर्णय

भारतीय राष्ट्रवाद, मुस्लिम राजनीति, सिख हित और ब्रिटिश सत्ता हस्तांतरण के बारह प्रमुख व्यक्तित्व

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंस्करण 1.0 · 20 जुलाई 2026

विभाजन का इतिहास महान व्यक्तियों की जीवनी मात्र नहीं है, लेकिन नेतृत्व ने उपलब्ध विकल्पों को स्वीकार, अस्वीकार और पुनर्परिभाषित किया। सभी व्यक्तित्वों को समान नाम-शैली, स्वतंत्र क्रमांक और उनके निर्णयों के ऐतिहासिक संदर्भ के साथ प्रस्तुत किया गया है।

5.1

महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी

मोहनदास करमचंद गांधी (1869–1948) ने सत्याग्रह, अहिंसा और जनभागीदारी के माध्यम से स्वतंत्रता आंदोलन को अभिजात संवैधानिक राजनीति से व्यापक जन-आंदोलन में बदला। असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन उनके नेतृत्व के तीन निर्णायक चरण थे।

गांधी भारत को अनेक धर्मों और संस्कृतियों का साझा राष्ट्र मानते थे। खिलाफत आंदोलन को असहयोग से जोड़ने का उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक एकता बनाना था; इस रणनीति की उपलब्धियों और दीर्घकालीन प्रभावों पर इतिहासकारों में मतभेद हैं।

वे पाकिस्तान की मांग और धार्मिक आधार पर विभाजन के विरोधी रहे। अक्टूबर 1946 के बाद नोआखाली में उनकी शांति-यात्रा, अगस्त–सितंबर 1947 में कलकत्ता प्रवास और जनवरी 1948 का दिल्ली उपवास सांप्रदायिक हिंसा रोकने के उनके अंतिम प्रमुख हस्तक्षेप थे। 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी।

मुख्य तथ्य

गांधी विभाजन को रोक नहीं सके, पर अंतिम समय तक संयुक्त राष्ट्रवाद, नागरिक सुरक्षा और सांप्रदायिक शांति के पक्ष में खड़े रहे।

5.2

पंडित जवाहरलाल नेहरू

जवाहरलाल नेहरू (1889–1964) कांग्रेस के प्रमुख नेता, 1929 के लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष और स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे। वे संसदीय लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्ष नागरिकता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक औद्योगिक विकास पर आधारित भारत की कल्पना करते थे।

1946 में वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में वे अंतरिम सरकार के वास्तविक प्रमुख बने। कैबिनेट मिशन योजना के संबंध में कांग्रेस की प्राथमिकता निर्वाचित संविधान सभा और ऐसी संघीय व्यवस्था थी जिसमें केंद्र पूरी तरह शक्तिहीन न हो। जुलाई 1946 के उनके वक्तव्यों को लीग ने समूह-व्यवस्था से पीछे हटने का संकेत माना; इस प्रसंग के महत्व पर इतिहासकारों में बहस है।

नेहरू प्रारंभ में संयुक्त भारत के समर्थक थे, लेकिन 1946–47 के गतिरोध, हिंसा और सत्ता हस्तांतरण के दबाव में विभाजन स्वीकार करने वाले कांग्रेस नेतृत्व का हिस्सा बने। 14–15 अगस्त की मध्यरात्रि को उनका ‘Tryst with Destiny’ भाषण स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक और सामाजिक प्रतिबद्धताओं की घोषणा बना।

मुख्य तथ्य

नेहरू की भूमिका को केवल विभाजन-स्वीकृति से नहीं, मजबूत केंद्र, संविधान सभा और स्वतंत्र भारत की संस्थागत परिकल्पना के साथ पढ़ना आवश्यक है।

5.3

सरदार वल्लभभाई पटेल

वल्लभभाई पटेल (1875–1950) कांग्रेस के प्रमुख संगठनकर्ता, बारडोली सत्याग्रह के नेता तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे। वे गांधी के निकट सहयोगी थे, किंतु प्रशासन और सत्ता-संरचना के प्रश्नों पर अधिक व्यावहारिक तथा निर्णायक माने जाते थे।

पटेल संयुक्त भारत के समर्थक थे, पर 1946–47 में अंतरिम सरकार के भीतर गतिरोध, पंजाब-बंगाल की हिंसा और लीग की पाकिस्तान मांग के बीच वे विभाजन को दीर्घकालीन गृह-संघर्ष से बचने का कठोर व्यावहारिक विकल्प मानने लगे। कांग्रेस द्वारा 3 जून योजना स्वीकार करने में उनका समर्थन निर्णायक था।

स्वतंत्रता के बाद वी. पी. मेनन के साथ उन्होंने रियासतों से विलय-पत्र पर सहमति बनाने और भारतीय संघ का राजनीतिक एकीकरण करने का नेतृत्व किया। जूनागढ़, हैदराबाद और जम्मू-कश्मीर की परिस्थितियाँ अलग-अलग थीं; इन्हें एक ही प्रकार के विलय के रूप में नहीं देखा जा सकता।

मुख्य तथ्य

पटेल ने विभाजन को आदर्श नहीं, तत्कालीन संकट में व्यावहारिक समाधान माना; रियासतों का एकीकरण उनकी सबसे स्थायी प्रशासनिक उपलब्धि बना।

5.4

मोहम्मद अली जिन्ना

मोहम्मद अली जिन्ना (1876–1948) बैरिस्टर, संवैधानिक राजनेता, मुस्लिम लीग के प्रमुख नेता और पाकिस्तान के संस्थापक थे। प्रारंभिक राजनीतिक जीवन में वे कांग्रेस तथा लीग दोनों से जुड़े रहे और 1916 के लखनऊ समझौते के संदर्भ में हिंदू–मुस्लिम एकता के समर्थक माने गए।

1930 के दशक में लंदन से लौटने के बाद उन्होंने लीग को पुनर्गठित किया। 1937 के चुनाव, कांग्रेस–लीग प्रतिस्पर्धा और मुस्लिम प्रतिनिधित्व के विवाद के बाद उनकी राजनीति पृथक मुस्लिम राष्ट्रीयता की ओर निर्णायक रूप से बढ़ी। 1940 के लाहौर प्रस्ताव और 1945–46 के चुनावी परिणामों ने उनके दावे को व्यापक राजनीतिक शक्ति दी।

कैबिनेट मिशन योजना को लीग ने प्रारंभ में स्वीकार किया, क्योंकि अनिवार्य समूह-व्यवस्था मुस्लिम-बहुल प्रांतों को सामूहिक शक्ति देती थी; बाद में लीग ने समर्थन वापस लेकर प्रत्यक्ष कार्रवाई का आह्वान किया। 14 अगस्त 1947 को जिन्ना पाकिस्तान के प्रथम गवर्नर-जनरल बने। 11 अगस्त के संविधान सभा भाषण में उन्होंने नागरिक समानता और धार्मिक स्वतंत्रता पर बल दिया।

मुख्य तथ्य

जिन्ना की राजनीति संवैधानिक सुरक्षा की मांग से पृथक संप्रभु राष्ट्र तक विकसित हुई; उनके लक्ष्य और रणनीति की व्याख्या इतिहासलेखन की केंद्रीय बहस है।

5.5

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद

मौलाना अबुल कलाम आज़ाद (1888–1958) इस्लामी विद्वान, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे। उनके पत्र ‘अल-हिलाल’ और ‘अल-बलाग़’ ने औपनिवेशिक शासन की आलोचना तथा राष्ट्रवादी चेतना के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1940 से 1946 तक कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उन्होंने क्रिप्स मिशन, भारत छोड़ो आंदोलन के दौर और कैबिनेट मिशन वार्ताओं में कांग्रेस का नेतृत्व किया। वे संयुक्त अथवा मिश्रित भारतीय राष्ट्रवाद के समर्थक और द्विराष्ट्र सिद्धांत के स्पष्ट विरोधी थे।

आज़ाद ने कैबिनेट मिशन योजना को संयुक्त भारत बचाने का अंतिम व्यावहारिक अवसर माना। स्वतंत्रता के बाद वे भारत के प्रथम शिक्षा मंत्री बने और उच्च शिक्षा, विज्ञान तथा सांस्कृतिक संस्थाओं की आधारशिला रखने में योगदान दिया। उनकी पुस्तक ‘India Wins Freedom’ विभाजन संबंधी नेतृत्वगत निर्णयों का महत्वपूर्ण, किंतु आत्मकथात्मक, स्रोत है।

मुख्य तथ्य

आज़ाद ने मुस्लिम पहचान और साझा भारतीय राष्ट्रीयता को परस्पर विरोधी मानने से इनकार किया और विभाजन का अंत तक विरोध किया।

5.6

लियाक़त अली ख़ान

लियाक़त अली ख़ान (1895–1951) मुस्लिम लीग के वरिष्ठ नेता, जिन्ना के निकट सहयोगी और पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री थे। 1930–40 के दशकों में उन्होंने लीग के केंद्रीय संगठन, संसदीय रणनीति और पाकिस्तान अभियान को मजबूत करने में प्रमुख भूमिका निभाई।

अक्टूबर 1946 में लीग के अंतरिम सरकार में शामिल होने पर उन्हें वित्त विभाग मिला। फरवरी 1947 में प्रस्तुत उनके बजट में ऊँची आय और व्यावसायिक लाभ पर कर तथा कर-चोरी की जाँच के प्रस्ताव थे; कांग्रेस के अनेक उद्योग-समर्थक नेताओं ने इसे राजनीतिक दबाव की रणनीति माना, जबकि लीग ने इसे आर्थिक न्याय का कार्यक्रम बताया।

पाकिस्तान बनने के बाद उन्होंने प्रशासनिक संस्थाएँ खड़ी करने और शरणार्थी संकट से निपटने का नेतृत्व किया। 1950 का नेहरू–लियाक़त समझौता दोनों देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए था। 16 अक्टूबर 1951 को रावलपिंडी में उनकी हत्या कर दी गई।

मुख्य तथ्य

लियाक़त लीग के केवल सहायक नेता नहीं, अंतरिम सरकार और पाकिस्तान की प्रारंभिक राज्य-व्यवस्था के प्रमुख निर्माता थे।

5.7

लॉर्ड लिनलिथगो

विक्टर होप, द्वितीय मार्क्वेस ऑफ लिनलिथगो (1887–1952), 1936 से 1943 तक भारत के वायसराय रहे। उनके कार्यकाल में 1935 के अधिनियम के अंतर्गत प्रांतीय स्वायत्तता लागू हुई और 1937 के चुनावों के बाद भारतीय मंत्रिमंडल बने।

3 सितंबर 1939 को उन्होंने भारतीय नेताओं से पूर्व परामर्श किए बिना भारत को जर्मनी के विरुद्ध युद्धरत घोषित किया। कांग्रेस मंत्रिमंडलों के इस्तीफ़े, लीग के ‘मुक्ति दिवस’, अगस्त प्रस्ताव और क्रिप्स मिशन की पृष्ठभूमि इसी युद्धकालीन नीति में बनी।

अगस्त 1942 में उनके प्रशासन ने भारत छोड़ो आंदोलन के आरंभ में ही कांग्रेस नेतृत्व को गिरफ्तार कर कठोर दमन किया। इससे कांग्रेस–ब्रिटिश विश्वास लगभग समाप्त हुआ, जबकि लीग को संगठन विस्तार का अवसर मिला।

मुख्य तथ्य

लिनलिथगो की युद्ध-घोषणा और दमनकारी नीति ने संवैधानिक सहयोग की संभावनाएँ कमजोर कर भारतीय राजनीति का ध्रुवीकरण बढ़ाया।

5.8

लॉर्ड आर्चिबाल्ड वेवल

फील्ड मार्शल आर्चिबाल्ड वेवल (1883–1950) अक्टूबर 1943 से मार्च 1947 तक भारत के वायसराय रहे। उनके आगमन के समय बंगाल अकाल, युद्धकालीन संकट और कांग्रेस नेतृत्व का कारावास प्रमुख चुनौतियाँ थीं।

जून 1945 की वेवल योजना ने वायसराय और सेनाध्यक्ष को छोड़कर कार्यकारिणी परिषद के अधिकांश पद भारतीयों को देने तथा ‘सवर्ण हिंदू’ और मुस्लिम प्रतिनिधित्व में लगभग समानता का प्रस्ताव रखा।

शिमला सम्मेलन में मुख्य विवाद मुस्लिम सदस्यों के नामांकन पर हुआ। जिन्ना चाहते थे कि सभी मुस्लिम सदस्य केवल लीग नामित करे; कांग्रेस इस दावे को स्वीकार नहीं कर सकती थी। सम्मेलन की विफलता ने 1945–46 के चुनावों और कैबिनेट मिशन की आवश्यकता पैदा की।

मुख्य तथ्य

वेवल ने समझौते का प्रयास किया, पर उनकी योजना ने लीग के एकमात्र मुस्लिम प्रतिनिधित्व के दावे को निर्णायक विवाद बना दिया।

5.9

लॉर्ड लुई माउंटबेटन

लॉर्ड लुई माउंटबेटन (1900–1979) ने 24 मार्च 1947 को भारत के अंतिम वायसराय के रूप में पदभार संभाला। उन्हें जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण की एटली सरकार की समय-सीमा के भीतर समाधान निकालना था।

उन्होंने गांधी, नेहरू, पटेल, जिन्ना, आज़ाद और सिख प्रतिनिधियों से तीव्र वार्ताएँ कीं। संयुक्त भारत की नई योजना पर सहमति न बनने के बाद 3 जून योजना में पंजाब और बंगाल के विभाजन, जनमत-संग्रह और दो डोमिनियन का प्रस्ताव स्वीकार किया गया।

माउंटबेटन ने सत्ता हस्तांतरण की तारीख 15 अगस्त 1947 कर दी—घोषित अंतिम सीमा से लगभग दस महीने पहले। समर्थक इसे प्रशासनिक विघटन रोकने का प्रयास मानते हैं; आलोचक अधूरी सुरक्षा, सीमा-निर्धारण और पुनर्वास तैयारी को इस जल्दबाज़ी से जोड़ते हैं। वे स्वतंत्र भारत के प्रथम गवर्नर-जनरल भी बने।

मुख्य तथ्य

माउंटबेटन ने विभाजन का मूल राजनीतिक विवाद पैदा नहीं किया, पर उसे लागू करने की गति और प्रशासनिक स्वरूप पर उनका प्रत्यक्ष प्रभाव था।

5.10

क्लेमेंट रिचर्ड एटली

क्लेमेंट एटली (1883–1967) 1945 से 1951 तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और लेबर पार्टी के नेता थे। उनकी सरकार ने भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त करने का अंतिम राजनीतिक निर्णय लिया।

युद्धोत्तर ब्रिटेन की आर्थिक कमजोरी, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन, प्रशासनिक लागत, 1946 का नौसैनिक विद्रोह, सशस्त्र बलों में बदलता वातावरण और उपनिवेशवाद-विरोधी अंतरराष्ट्रीय दबाव सत्ता हस्तांतरण की व्यापक पृष्ठभूमि थे; इनके सापेक्ष महत्व पर इतिहासकारों में मतभेद हैं।

एटली सरकार ने 1946 में कैबिनेट मिशन भेजा। उसकी विफलता और 1946–47 की हिंसा के बाद 20 फरवरी 1947 को एटली ने जून 1948 तक सत्ता हस्तांतरण तथा माउंटबेटन की नियुक्ति घोषित की। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम उनकी सरकार ने ब्रिटिश संसद से पारित कराया।

मुख्य तथ्य

एटली ने भारत छोड़ने की नीति, अंतिम समय-सीमा और विधिक सत्ता हस्तांतरण को ब्रिटिश मंत्रिमंडल की आधिकारिक दिशा दी।

5.11

विनायक दामोदर सावरकर

विनायक दामोदर सावरकर (1883–1966) क्रांतिकारी राष्ट्रवादी, लेखक और हिंदू महासभा के प्रमुख नेता थे। अभिनव भारत तथा लंदन के क्रांतिकारी नेटवर्क से जुड़ाव के बाद उन्हें गिरफ़्तार कर अंडमान की सेल्युलर जेल भेजा गया; बाद में वे रत्नागिरी में प्रतिबंधित रहे।

1923 में प्रकाशित ‘Hindutva: Who Is a Hindu?’ में उन्होंने हिंदुत्व को धार्मिक आस्था से व्यापक सांस्कृतिक-राजनीतिक पहचान के रूप में प्रस्तुत किया। 1937 से हिंदू महासभा अध्यक्ष के रूप में उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग—दोनों की नीतियों की आलोचना की।

सावरकर पाकिस्तान और भारत के भौगोलिक विभाजन के विरोधी थे, किंतु हिंदू और मुसलमानों को अलग राजनीतिक राष्ट्र अथवा समुदाय मानने वाले कथन भी देते थे। इसलिए उनके विचारों और लीग के द्विराष्ट्र सिद्धांत की समानताओं तथा संप्रभुता संबंधी मूलभूत अंतर पर बहस होती है। गांधी हत्या मुकदमे में वे साक्ष्य के अभाव में बरी हुए; बाद की आयोगीय टिप्पणियाँ अलग इतिहासलेखन-विवाद का विषय हैं।

मुख्य तथ्य

सावरकर के अखंड भारत, हिंदुत्व और राजनीतिक समुदाय संबंधी विचारों को एक-दूसरे से अलग किए बिना उनका संतुलित मूल्यांकन संभव नहीं है।

5.12

मास्टर तारा सिंह

मास्टर तारा सिंह (1885–1967) गुरुद्वारा सुधार आंदोलन, शिरोमणि अकाली दल और SGPC से जुड़े प्रमुख सिख नेता थे। 1920 के दशक से वे धार्मिक संस्थाओं के लोकतांत्रिक प्रबंधन और सिख राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रभावशाली प्रवक्ता बने।

1940 के दशक में सिख पूरे पंजाब में अल्पसंख्यक थे, लेकिन मध्य और पूर्वी जिलों में उनकी भूमि, धार्मिक केंद्र और सैन्य-सामाजिक उपस्थिति महत्वपूर्ण थी। पाकिस्तान की मांग ने ननकाना साहिब सहित पश्चिमी पंजाब के गुरुद्वारों, कृषि संपत्ति और समुदाय की सुरक्षा को गंभीर प्रश्न बनाया।

तारा सिंह ने प्रारंभ में भारत-विभाजन का विरोध किया। जब संपूर्ण पंजाब के पाकिस्तान में जाने की संभावना बढ़ी तो उन्होंने पंजाब-विभाजन का समर्थन किया, ताकि पूर्वी क्षेत्र भारत में रहें। स्वतंत्रता के बाद वे पंजाबी सूबा आंदोलन के प्रमुख नेता बने; 1966 के पुनर्गठन ने वर्तमान पंजाब और हरियाणा की संरचना बनाई।

मुख्य तथ्य

तारा सिंह की राजनीति को केवल पाकिस्तान-विरोध नहीं, विभाजन की स्थिति में सिख समुदाय की सुरक्षा, भूगोल और संस्थागत भविष्य की चिंता के रूप में समझना चाहिए।

OCN ऐतिहासिक आकलन

किसी एक नेता को पूर्ण उत्तरदायित्व देना इतिहास की संरचनात्मक जटिलता को मिटा देता है; नेतृत्व को महत्वहीन मानना भी उतना ही गलत है। नेताओं के निर्णय चुनावी जनादेश, संस्थागत सीमाओं, हिंसा, समय-दबाव और उनकी राष्ट्र-कल्पनाओं से प्रभावित थे। इसलिए तथ्य, उपलब्ध विकल्प और निर्णय के परिणाम—तीनों को साथ पढ़ना आवश्यक है।