omkarchaudhary.comJOURNALIST · AUTHOR · RESEARCHEROCN Research Desk
दस्तावेज़ · तथ्य · विश्लेषण
OCN Research Dossier–002 · पूरक अध्याय 04

21 अक्टूबर 1997:
विश्वास मत और हिंसा

कल्याण सिंह सरकार के बहुमत परीक्षण, सदन में अभूतपूर्व संघर्ष और दलबदल के संवैधानिक विवाद का दस्तावेज़ी अध्ययन

Omkar Chaudhary / OCN Research Deskसंस्करण 1.0 · 19 जुलाई 2026
पूरक ऐतिहासिक एवं संवैधानिक अध्ययन

एक विश्वास मत, जो संसदीय इतिहास का हिंसक दृश्य बन गया

21 अक्टूबर 1997 को उत्तर प्रदेश विधानसभा में मुख्यमंत्री कल्याण सिंह अपनी सरकार का बहुमत सिद्ध करने पहुँचे थे। सरकार के संवैधानिक अस्तित्व का निर्णय मतदान से होना था, लेकिन कार्यवाही शीघ्र ही नारेबाज़ी, वेल में विरोध, हाथापाई और वस्तुएँ फेंके जाने की हिंसा में बदल गई। माइक, लकड़ी के साउंड बॉक्स, मेजों के हिस्से और अन्य सामान प्रहार के लिए इस्तेमाल किए जाने के दृश्य कैमरों में दर्ज हुए। यही दृश्य आज भी सोशल मीडिया पर प्रसारित होते हैं—और कई बार गलत ढंग से 16 दिसंबर 1993 की घटना बताए जाते हैं।

यह अध्याय इसलिए 1993 के मूल डॉसियर के भीतर रखा गया है कि दोनों घटनाओं को एक साथ पढ़ा जा सके, लेकिन एक समझा न जाए। 1993 में नई सपा–बसपा सरकार और विपक्ष के टकराव के बीच हिंसा हुई थी; 1997 में भाजपा–बसपा सत्ता-साझेदारी टूटने के बाद कल्याण सिंह सरकार के विश्वास मत के दौरान। तारीख, राजनीतिक परिस्थिति, सदन की प्रक्रिया और उपलब्ध दृश्य-अभिलेख—सभी अलग हैं।

1996 का खंडित जनादेश और लंबा गतिरोध

1996 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरी, लेकिन अकेले सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी। समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और अन्य दलों की उपस्थिति ने विधानसभा को खंडित जनादेश दिया। सरकार गठन की अनिश्चितता लंबी चली और अंततः भाजपा तथा बसपा ने सत्ता-साझेदारी का असामान्य समझौता किया।

यह गठबंधन वैचारिक समानता से अधिक तत्काल राजनीतिक आवश्यकता पर आधारित था। मुख्यमंत्री पद को बारी-बारी से दोनों दलों को देने की व्यवस्था बनी। पहले चरण में मायावती ने सरकार का नेतृत्व किया; फिर सितंबर 1997 में सत्ता भाजपा को हस्तांतरित हुई और कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने। समझौते ने तत्काल गतिरोध तो समाप्त किया, लेकिन प्रशासनिक फैसलों, नेतृत्व, सामाजिक आधार और परस्पर अविश्वास से जुड़ी दरारें बनी रहीं।

सत्ता हस्तांतरण से समर्थन वापसी तक

सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय में दर्ज कालक्रम के अनुसार मायावती के बाद कल्याण सिंह ने सितंबर 1997 में मुख्यमंत्री पद संभाला। 19 अक्टूबर को मायावती ने गठबंधन सरकार से बसपा की भागीदारी और समर्थन वापस लेने की घोषणा की तथा बसपा मंत्रियों ने इस्तीफा दिया। राज्यपाल ने 21 अक्टूबर को विशेष सत्र बुलाकर मुख्यमंत्री को सदन के पटल पर बहुमत सिद्ध करने को कहा।

20 अक्टूबर को बसपा विधायकों के लिए व्हिप जारी हुआ कि वे अगले दिन सदन में उपस्थित रहें और विश्वास प्रस्ताव के विरुद्ध मतदान करें। इस प्रकार अगले दिन का परीक्षण तीन स्तरों पर निर्णायक था—क्या सरकार के पास बहुमत है, क्या गठबंधन टूटने के बाद नए समर्थन का दावा टिकता है, और क्या विधायक अपने दल के निर्देश के अनुसार मतदान करेंगे।

विश्वास मत का संवैधानिक अर्थ

संविधान के अनुच्छेद 164(2) के अनुसार राज्य की मंत्रिपरिषद विधानसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है। जब मुख्यमंत्री के बहुमत पर संदेह पैदा हो, तो दावों का अंतिम परीक्षण राजभवन, प्रेस सम्मेलन या दलों की सूची से नहीं, सदन के पटल पर होना चाहिए। इसी सिद्धांत के कारण विश्वास मत सामान्य प्रस्ताव नहीं होता; उसका परिणाम सरकार के पद पर बने रहने की वैधता तय करता है।

लेकिन 21 अक्टूबर की घटना एक कठिन लोकतांत्रिक प्रश्न छोड़ती है: यदि बहुमत परीक्षण के समय सदन में व्यापक हिंसा हो, अनेक सदस्य बाहर चले जाएँ और कार्यवाही असाधारण अव्यवस्था में चले, तो अंकगणितीय परिणाम और प्रक्रिया की संस्थागत विश्वसनीयता को किस प्रकार साथ पढ़ा जाए? उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड मतदान का परिणाम बताता है; हिंसक वातावरण उस प्रक्रिया की राजनीतिक और नैतिक वैधता पर स्थायी बहस पैदा करता है।

21 अक्टूबर: घटनाक्रम का सावधान पुनर्निर्माण

01

विशेष सत्र

राज्यपाल के निर्देश पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया गया। केंद्रीय विषय कल्याण सिंह सरकार का विश्वास प्रस्ताव था। अध्यक्ष केशरी नाथ त्रिपाठी के सामने अत्यंत तनावपूर्ण सदन संचालित करने की चुनौती थी।

02

विरोध और वेल

सरकार के समर्थन-आधार और प्रक्रिया पर विपक्ष का विरोध तेज हुआ। सदस्य वेल में पहुँचे और सामान्य बहस तथा अनुशासित मतदान का वातावरण टूट गया।

03

शारीरिक संघर्ष

नारेबाज़ी और धक्का-मुक्की व्यापक हाथापाई में बदली। उपलब्ध वीडियो और न्यायिक रिकॉर्ड माइक, साउंड बॉक्स तथा फर्नीचर के हिस्से फेंके जाने और प्रहार में उपयोग होने की पुष्टि करते हैं।

04

मतदान और घोषणा

हिंसा के बीच कई सदस्य बाहर चले गए। बाद की कार्यवाही में 222 सदस्यों ने सरकार के पक्ष में मत दिया और विरोध में कोई मत दर्ज नहीं हुआ। सरकार को विश्वास मत प्राप्त घोषित किया गया।

क्या स्थापित है और क्या अब भी विवादित?

स्थापित तथ्य: विश्वास प्रस्ताव पेश हुआ; सदन में गंभीर हिंसा और अव्यवस्था हुई; कई विधायक बाहर गए; 222 मत सरकार के पक्ष में दर्ज हुए; बसपा के 12 विधायकों ने सरकार का समर्थन किया; और इन विधायकों की अयोग्यता का विवाद बाद में सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। घटना का वीडियो-अभिलेख उपलब्ध है, इसलिए इसे 1993 की घटना से अलग पहचानना संभव है।

अपूर्ण या पक्षगत विवरण: पहला प्रहार किसने किया, हिंसा पूर्वनियोजित थी या तत्काल भड़की, कौन-कौन सदस्य घायल हुए, मार्शलों ने किस क्रम में हस्तक्षेप किया और विधानसभा की संपत्ति को कुल कितनी क्षति हुई—इन प्रश्नों पर उपलब्ध सार्वजनिक सामग्री पूर्ण नहीं है। न्यायिक निर्णय में उद्धृत आरोप संबंधित कार्यवाही के रिकॉर्ड का हिस्सा हैं; उन्हें स्वतंत्र आपराधिक निष्कर्ष के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा।

बसपा के 12 विधायक और दसवीं अनुसूची

विश्वास मत में बसपा के 12 विधायकों ने पार्टी निर्देश के विपरीत कल्याण सिंह सरकार का समर्थन किया। मायावती ने उनके विरुद्ध विधानसभा अध्यक्ष के सामने दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाएँ दाखिल कीं। प्रतिवादी विधायकों ने दावा किया कि 21 अक्टूबर को बसपा में विभाजन हुआ और एक-तिहाई से अधिक विधायकों का अलग समूह बना, इसलिए उस समय लागू दसवीं अनुसूची के पुराने पैरा 3 की सुरक्षा उन्हें प्राप्त थी। उन्होंने ‘जनतांत्रिक बसपा’ समूह का आधार भी प्रस्तुत किया।

अध्यक्ष ने विभाजन का दावा स्वीकार किया और अयोग्यता याचिकाएँ खारिज कर दीं। विवाद Mayawati v. Markandeya Chand के रूप में सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। 9 अक्टूबर 1998 के निर्णय में बहुमत ने अध्यक्ष के निष्कर्ष में हस्तक्षेप किया। न्यायालय ने माना कि कथित विभाजन के लिए आवश्यक संख्या का दावा विश्वसनीय रूप से सिद्ध नहीं हुआ और 12 विधायक दसवीं अनुसूची के पैरा 2(1)(a) के तहत अयोग्य हुए। निर्णय ने यह भी स्पष्ट किया कि अध्यक्ष का फैसला पूर्ण न्यायिक प्रतिरक्षा में नहीं है; संवैधानिक उल्लंघन, दुर्भावना, प्राकृतिक न्याय की अवहेलना या विकृत निष्कर्ष के सीमित आधारों पर उसकी समीक्षा हो सकती है।

यहाँ एक ऐतिहासिक परिवर्तन भी ध्यान देने योग्य है। 1997 में दसवीं अनुसूची का पैरा 3 एक-तिहाई सदस्यों वाले ‘विभाजन’ को सुरक्षा देता था। 2003 के 91वें संविधान संशोधन ने यह प्रावधान हटा दिया। इसलिए उस समय का विवाद आज के दलबदल कानून पर ज्यों का त्यों लागू नहीं किया जा सकता, यद्यपि अध्यक्ष की भूमिका और न्यायिक समीक्षा के सिद्धांत अब भी महत्वपूर्ण हैं।

अध्यक्ष, राज्यपाल और न्यायपालिका—तीन संस्थागत भूमिकाएँ

राज्यपाल: समर्थन वापसी के बाद सरकार को सदन में बहुमत सिद्ध करने का निर्देश दिया। यह उस संवैधानिक सिद्धांत के अनुरूप था कि बहुमत का परीक्षण विधानसभा में हो। अध्यक्ष: हिंसा के बीच कार्यवाही संचालित की, मतदान का परिणाम घोषित किया और बाद में दलबदल याचिकाओं पर निर्णय दिया। इन दोनों भूमिकाओं ने अध्यक्षीय निष्पक्षता, सदन के नियंत्रण और प्रमाण के मूल्यांकन पर बहस को जन्म दिया।

न्यायपालिका: सर्वोच्च न्यायालय ने विश्वास मत को उलटकर सरकार नहीं गिराई; उसने बाद के दलबदल विवाद में अध्यक्ष के निष्कर्ष की सीमित न्यायिक समीक्षा की। निर्णय में यह भी दर्ज किया गया कि 12 मत घटाने पर भी एक अन्य 1998 के समग्र मतदान में कल्याण सिंह बहुमत में रहते, इसलिए अयोग्यता का निर्णय सरकार को स्वतः अस्थिर करने के उद्देश्य से नहीं था। मुख्य प्रश्न विधायकों की सदस्यता और दसवीं अनुसूची की संवैधानिक मर्यादा था।

1993 और 1997: समान दृश्य, अलग इतिहास

16 दिसंबर 1993नई सपा–बसपा सरकार की पृष्ठभूमिराज्यपाल के अभिभाषण के बाद टकरावदृश्य-अभिलेख सार्वजनिक रूप से सीमितवायरल कुर्सी–माइक वीडियो इस दिन का नहीं
21 अक्टूबर 1997भाजपा–बसपा गठबंधन टूटने की पृष्ठभूमिकल्याण सिंह सरकार का विश्वास मतटीवी कैमरों में व्यापक हिंसा दर्जवायरल कुर्सी–माइक वीडियो इसी घटना का

दोनों घटनाएँ उत्तर प्रदेश की अस्थिर और तीव्र ध्रुवीकृत राजनीति में हुईं तथा दोनों ने सदन की मर्यादा को गंभीर क्षति पहुँचाई। फिर भी किसी वीडियो को गलत तारीख से जोड़ना केवल छोटी तथ्यात्मक भूल नहीं है—इससे जिम्मेदारी, राजनीतिक संदर्भ और संवैधानिक प्रश्न तीनों बदल जाते हैं। ऐतिहासिक स्मृति की विश्वसनीयता के लिए तारीख और दृश्य की सही पहचान अनिवार्य है।

लोकतांत्रिक और संस्थागत सबक

विधानमंडल का उद्देश्य राजनीतिक संघर्ष को नियमबद्ध बहस और मतदान में बदलना है। 21 अक्टूबर 1997 को यह क्रम उलट गया: बहुमत के शांतिपूर्ण परीक्षण का मंच स्वयं शारीरिक संघर्ष का स्थल बना। इससे तीन बुनियादी सुधारों की आवश्यकता सामने आती है—विश्वास मत के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक प्रक्रिया; वेल में हिंसा या संपत्ति के दुरुपयोग पर त्वरित, समान अनुशासन; और कार्यवाही, वीडियो, अध्यक्षीय आदेश तथा सुरक्षा रिपोर्ट का सुरक्षित डिजिटल अभिलेखीकरण।

दलबदल विवाद का सबक भी उतना ही गहरा है। निर्वाचित प्रतिनिधि की स्वतंत्रता, पार्टी अनुशासन और सरकार की स्थिरता के बीच संतुलन केवल संख्या से तय नहीं होता। यदि अध्यक्ष ही निर्णायक प्राधिकारी हों, तो पारदर्शी प्रक्रिया, समयबद्ध निर्णय और कारणयुक्त आदेश आवश्यक हैं। न्यायिक समीक्षा अंतिम सुरक्षा है, लेकिन वह सदन के भीतर तत्काल निष्पक्ष प्रक्रिया का विकल्प नहीं हो सकती।