अरविंद केजरीवाल से अलगाव
जनआंदोलन और चुनावी राजनीति के बीच निर्णायक वैचारिक विभाजन
अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल का अलगाव केवल दो व्यक्तियों का विवाद नहीं था। वह इस बुनियादी प्रश्न पर विभाजन था कि व्यवस्था-परिवर्तन बाहर से जनदबाव बनाकर होगा या चुनाव लड़कर सत्ता-संस्थाओं के भीतर प्रवेश करके।
साझा आंदोलन
केजरीवाल की संगठनात्मक और संचार क्षमता तथा अन्ना की गांधीवादी सार्वजनिक छवि ने आंदोलन को व्यापक अपील दी। दोनों की भूमिकाएँ अलग लेकिन परस्पर पूरक थीं।
2011 की सफलता के बाद यही प्रश्न सामने आया कि जनसमर्थन को आगे किस रूप में संगठित किया जाए।
राजनीति में प्रवेश पर मतभेद
केजरीवाल पक्ष ने तर्क दिया कि मौजूदा दलों से अपेक्षित लोकपाल और राजनीतिक सुधार संभव नहीं हैं; इसलिए नया राजनीतिक विकल्प बनाना चाहिए।
अन्ना का मत था कि सत्ता और चुनाव आंदोलन की नैतिक स्वतंत्रता को कमजोर करेंगे। वे किसी दल या उम्मीदवार के पक्ष में संगठन खड़ा करने को तैयार नहीं थे।
आम आदमी पार्टी का गठन
केजरीवाल और सहयोगियों ने आम आदमी पार्टी की स्थापना की। अन्ना ने अपना नाम और प्रतीक राजनीतिक दल के लिए उपयोग न करने की बात स्पष्ट की।
विभाजन के बाद भी दोनों पक्षों ने भ्रष्टाचार-विरोध और पारदर्शिता को अपनी भाषा में बनाए रखा, लेकिन सार्वजनिक रास्ते अलग हो गए।
चुनावी सफलता और नई बहस
दिल्ली विधानसभा चुनाव में AAP की सफलता ने साबित किया कि आंदोलन की ऊर्जा का एक हिस्सा चुनावी समर्थन में बदला जा सकता है।
दूसरी ओर, इससे आंदोलन की मूल दलनिरपेक्ष एकता समाप्त हुई। समर्थक और स्वयंसेवक राजनीतिक तथा गैर-राजनीतिक धाराओं में बँट गए।
व्यक्तिगत संबंध और सार्वजनिक मतभेद
अलगाव के बाद दोनों पक्षों ने एक-दूसरे के योगदान को पूरी तरह नकारा नहीं, लेकिन राजनीतिक रणनीति और नेतृत्व की कार्यशैली पर सार्वजनिक टिप्पणियाँ होती रहीं। अन्ना ने बार-बार स्पष्ट किया कि उनका नाम किसी दल के चुनाव प्रचार में उपयोग न किया जाए।
केजरीवाल पक्ष ने राजनीतिक प्रवेश को आंदोलन के उद्देश्यों को संस्थागत रूप देने का माध्यम बताया। अन्ना समर्थकों ने तर्क दिया कि सत्ता में प्रवेश से आंदोलन की नैतिक और सर्वदलीय अपील सीमित हो जाएगी।
बाद की घटनाओं ने दोनों तर्कों को आंशिक आधार दिया—AAP चुनावी शक्ति बनी, जबकि अन्ना दलगत राजनीति से बाहर नैतिक हस्तक्षेप करते रहे; साथ ही मूल राष्ट्रीय आंदोलन की संयुक्त शक्ति फिर नहीं बन सकी।
यह अलगाव भारतीय नागरिक समाज के लिए स्थायी प्रश्न छोड़ गया—क्या नैतिक जनआंदोलन सत्ता से दूरी रखकर अधिक प्रभावी रहता है, या कानून बदलने के लिए उसे चुनावी राजनीति में उतरना पड़ता है? दोनों रास्तों की उपलब्धियाँ और सीमाएँ आगे के वर्षों में स्पष्ट हुईं।