बाद के अनशन
लोकपाल, किसान, चुनाव सुधार और ग्राम स्वराज के प्रश्न
2011 के बाद अन्ना हजारे सार्वजनिक जीवन से अलग नहीं हुए, लेकिन उनके आंदोलनों की दृश्यता और सामाजिक संरचना बदल गई। राष्ट्रीय मीडिया-केंद्रित जनलोकपाल लहर के स्थान पर लोकपाल नियुक्ति, किसानों और चुनाव सुधारों से जुड़े अधिक सीमित अभियान सामने आए।
कानून के बाद नियुक्ति का प्रश्न
लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम 2013 पारित होने के बाद ध्यान संस्था की वास्तविक स्थापना, चयन प्रक्रिया और नियुक्ति पर गया। अन्ना ने देरी को लेकर सरकारों को पत्र लिखे और आंदोलन की चेतावनी दी।
कानून बनना और संस्था का प्रभावी संचालन अलग चरण हैं—बाद के अभियानों ने इसी अंतर को रेखांकित किया।
रामलीला मैदान का अनशन
लोकपाल नियुक्ति, किसानों के लिए लागत-आधारित मूल्य और चुनावी सुधारों सहित मांगों को लेकर अन्ना ने रामलीला मैदान में अनशन किया। सरकारी आश्वासनों के बाद उन्होंने इसे समाप्त किया।
यह आंदोलन 2011 जैसी देशव्यापी लामबंदी नहीं बना। टीम, राजनीतिक संदर्भ और मीडिया वातावरण बदल चुके थे।
रालेगण सिद्धि में अनशन
लोकपाल और लोकायुक्त नियुक्तियों की मांग पर उन्होंने अपने गाँव में अनशन किया। सरकार के साथ बातचीत और प्रक्रिया आगे बढ़ाने के आश्वासन के बाद अनशन समाप्त हुआ।
मार्च 2019 में भारत के पहले लोकपाल की नियुक्ति हुई—हालांकि इसे किसी एक आंदोलन का प्रत्यक्ष परिणाम कहना सरल निष्कर्ष होगा।
किसान और सार्वजनिक नीति
किसानों के प्रश्न, कृषि मूल्य, चुनाव सुधार और ग्राम स्वराज पर वे समय-समय पर बयान तथा आंदोलन की घोषणाएँ करते रहे। कुछ प्रस्तावित अनशन सरकारी संवाद के बाद स्थगित हुए।
बाद के वर्षों में प्रभाव स्थानीय और मुद्दा-विशेष अधिक रहा; फिर भी उनकी नैतिक प्रतीकात्मकता सार्वजनिक विमर्श में बनी रही।
बाद के आंदोलन छोटे क्यों रहे?
2011 में बड़े भ्रष्टाचार विवाद, व्यापक मध्यवर्गीय असंतोष, संयुक्त नेतृत्व और चौबीस घंटे की मीडिया कवरेज एक साथ मौजूद थे। बाद के आंदोलनों में यह अनुकूल संयोजन नहीं रहा।
टीम अन्ना विभाजित हो चुकी थी, सोशल मीडिया का वातावरण बदल गया था और लोकपाल का प्रश्न कानून बनने के बाद नियुक्ति तथा क्रियान्वयन की तकनीकी बहस में प्रवेश कर चुका था।
किसानों और चुनाव सुधारों की मांगें महत्वपूर्ण थीं, लेकिन उनके सामाजिक गठबंधन अलग थे। इसलिए कम भीड़ या कम मीडिया कवरेज को केवल व्यक्ति की लोकप्रियता में गिरावट से समझना पर्याप्त नहीं है।
बाद के आंदोलनों का सीमित प्रभाव अन्ना हजारे की व्यक्तिगत प्रासंगिकता के अंत का प्रमाण नहीं, बल्कि 2011 की असाधारण परिस्थितियों के पुनरावृत्त न हो पाने का संकेत है। संगठन, सहयोगी नेतृत्व, राजनीतिक अवसर और मीडिया—चारों बदल चुके थे।