जनलोकपाल आंदोलन की पृष्ठभूमि
लोकपाल की अवधारणा से जंतर-मंतर के अनशन तक
2011 का आंदोलन अचानक उत्पन्न नहीं हुआ। उसके पीछे चार दशक से लंबित लोकपाल विधेयक, 2000 के दशक के बड़े भ्रष्टाचार विवाद, RTI से बढ़ी नागरिक सक्रियता और विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं का साझा अभियान था।
लोकपाल की अवधारणा
प्रथम प्रशासनिक सुधार आयोग ने उच्च पदों पर भ्रष्टाचार की शिकायतों की स्वतंत्र जांच के लिए लोकपाल जैसी संस्था की सिफारिश की। 1968 में लोकपाल विधेयक पहली बार लोकसभा में पेश हुआ।
इसके बाद अलग-अलग सरकारों ने कई बार विधेयक प्रस्तुत किए, लेकिन संसद भंग होने, राजनीतिक मतभेदों या प्रक्रिया पूरी न होने के कारण कानून दशकों तक नहीं बन सका।
भ्रष्टाचार राष्ट्रीय प्रश्न बना
दूरसंचार स्पेक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल और अन्य विवादों ने शासन की पारदर्शिता पर व्यापक अविश्वास पैदा किया। मीडिया, न्यायालयीन कार्रवाइयों और नागरिक अभियानों ने भ्रष्टाचार को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया।
RTI के उपयोग से दस्तावेज़ी सवाल पूछने की नई नागरिक संस्कृति भी विकसित हो चुकी थी।
इंडिया अगेंस्ट करप्शन का मंच
अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, संतोष हेगड़े और अन्य कार्यकर्ता साझा अभियान में आए। अन्ना हजारे आंदोलन का सबसे व्यापक रूप से पहचाना जाने वाला नैतिक चेहरा बने।
नागरिक समाज के मसौदे को ‘जनलोकपाल’ कहा गया। सरकार और आंदोलनकारियों के मसौदों में अधिकार-क्षेत्र, नियुक्ति, जांच-स्वतंत्रता और प्रधानमंत्री सहित उच्च पदों की जवाबदेही पर मतभेद थे।
टकराव और अनशन की घोषणा
सरकार से वार्ता में सहमति न बनने पर अन्ना हजारे ने 5 अप्रैल से जंतर-मंतर पर अनशन की घोषणा की। सोशल मीडिया, स्वयंसेवक नेटवर्क और भ्रष्टाचार-विरोधी जनभावना ने इसे शीघ्र राष्ट्रीय अभियान में बदल दिया।
सरकारी लोकपाल और जनलोकपाल में अंतर
नागरिक समाज का मसौदा अधिक व्यापक अधिकार-क्षेत्र, स्वतंत्र जांच-तंत्र और समयबद्ध कार्रवाई पर जोर देता था। सरकार संवैधानिक संस्थाओं के बीच शक्ति-संतुलन, संसदीय विशेषाधिकार और मौजूदा जांच एजेंसियों की भूमिका को लेकर सावधान थी।
प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, सांसदों के सदन के भीतर आचरण, केंद्रीय कर्मचारियों और राज्यों के लोकायुक्त को एक ही कानून के अंतर्गत लाने पर गंभीर मतभेद थे।
यही असहमति आगे संयुक्त मसौदा समिति की बैठकों में उभरी। इसलिए अप्रैल 2011 का आंदोलन केवल ‘लोकपाल चाहिए या नहीं’ का विवाद नहीं था; असली संघर्ष संस्था की शक्ति, नियुक्ति, नियंत्रण और जवाबदेही के स्वरूप पर था।
जनलोकपाल आंदोलन की शक्ति उसके लंबे संस्थागत इतिहास और तत्काल राजनीतिक वातावरण—दोनों से निकली। 2011 ने लोकपाल की दशकों पुरानी बहस को जनभाषा दी, लेकिन नागरिक मसौदे को अंतिम संवैधानिक सत्य मानने के बजाय उसे विधायी वार्ता के एक पक्ष के रूप में पढ़ना आवश्यक है।