2011: जनलोकपाल आंदोलन
जंतर-मंतर से रामलीला मैदान तक दिनवार ऐतिहासिक पुनर्निर्माण
2011 का जनलोकपाल आंदोलन स्वतंत्र भारत के सबसे व्यापक शहरी नागरिक आंदोलनों में से एक बना। इसकी पहली अवस्था अप्रैल में संयुक्त मसौदा समिति की स्थापना तक पहुँची; दूसरी अवस्था अगस्त में गिरफ्तारी, तिहाड़ जेल, रामलीला मैदान और संसद की ‘सेंस ऑफ द हाउस’ प्रक्रिया के साथ चरम पर पहुँची।
जंतर-मंतर का अनशन
5 अप्रैल को अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर अनशन शुरू किया। दिल्ली से बाहर भी समर्थन-प्रदर्शन हुए और आंदोलन को टीवी तथा सोशल मीडिया पर व्यापक दृश्यता मिली।
सरकार ने मंत्रियों और नागरिक समाज प्रतिनिधियों की संयुक्त मसौदा समिति बनाने पर सहमति दी। 9 अप्रैल को अनशन समाप्त हुआ।
संयुक्त मसौदा समिति और मतभेद
समिति की बैठकों में लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र, प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, सांसदों के आचरण और जांच एजेंसियों पर मतभेद बने रहे। दोनों पक्ष एक साझा मसौदे पर सहमत नहीं हो सके।
यह चरण दिखाता है कि जनसमर्थन के बावजूद कानून की भाषा और संवैधानिक सीमाओं पर जटिल संस्थागत वार्ता आवश्यक थी।
गिरफ्तारी और तिहाड़ जेल
16 अगस्त को प्रस्तावित अनशन से पहले दिल्ली पुलिस ने अन्ना हजारे को हिरासत में लिया। उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के बाद तिहाड़ जेल भेजा गया। गिरफ्तारी से देशभर में विरोध तेज हुआ।
रिहाई का आदेश आने के बाद भी अनशन स्थल और शर्तों पर सहमति तक वे जेल परिसर में रहे। 19 अगस्त को वे रामलीला मैदान पहुँचे।
रामलीला मैदान और संसद
रामलीला मैदान में अनशन के साथ सार्वजनिक सभाएँ, वार्ताएँ और राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ जारी रहीं। स्वास्थ्य को लेकर चिंता बढ़ती गई।
संसद में लोकपाल से संबंधित मांगों—नागरिक चार्टर, निचली नौकरशाही और राज्यों में लोकायुक्त—पर चर्चा हुई। 27 अगस्त को सदन की भावना दर्ज किए जाने के बाद गतिरोध समाप्त करने का रास्ता बना।
अनशन की समाप्ति
28 अगस्त को अन्ना हजारे ने अनशन समाप्त किया। आंदोलन ने तत्काल जनलोकपाल कानून लागू नहीं कराया, लेकिन लोकपाल विधेयक पर राजनीतिक दबाव और सार्वजनिक अपेक्षा को असाधारण रूप से बढ़ा दिया।
2013 में पारित लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम नागरिक समाज के मूल जनलोकपाल मसौदे से कई मामलों में अलग था।
रामलीला मैदान: आठ निर्णायक दिन
20–22 अगस्त के बीच आंदोलन ने जनसमर्थन बनाए रखते हुए सरकार से लिखित और संस्थागत आश्वासन की मांग की। विभिन्न दलों, धार्मिक नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और मध्यस्थों की आवाजाही जारी रही।
23–25 अगस्त को अन्ना के स्वास्थ्य और वार्ता की धीमी गति ने दबाव बढ़ाया। सरकार के प्रतिनिधियों और टीम अन्ना के बीच मसौदे की भाषा, संसदीय प्रक्रिया तथा अनशन समाप्त करने की शर्तों पर लगातार चर्चा हुई।
26 अगस्त तक केंद्र बिंदु तीन मांगों पर आ गया—नागरिक चार्टर, निचली नौकरशाही को जवाबदेही के दायरे में लाना और राज्यों में लोकायुक्त की व्यवस्था। 27 अगस्त को संसद ने इन मुद्दों पर चर्चा कर सदन की भावना दर्ज की।
यह ‘सेंस ऑफ द हाउस’ विधेयक का अंतिम पारित रूप नहीं था, बल्कि आगे की संसदीय प्रक्रिया के लिए राजनीतिक सहमति का संकेत था। इसी अंतर को समझना आंदोलन के इतिहास के लिए अत्यंत आवश्यक है।
2011 की सबसे बड़ी उपलब्धि भ्रष्टाचार और संस्थागत जवाबदेही को राष्ट्रीय जनविमर्श में लाना थी। उसकी सीमा यह थी कि जनभावना, नागरिक मसौदा और संसदीय कानून के बीच अंतर को आंदोलन की भाषा में हमेशा स्पष्ट नहीं रखा गया। फिर भी इसने नागरिक भागीदारी और मीडिया-समर्थित आंदोलनों का नया राजनीतिक युग शुरू किया।