इंडिया अगेंस्ट करप्शन
अभियान, संगठन, जनसंचार और अंततः विभाजन
इंडिया अगेंस्ट करप्शन कोई परंपरागत राजनीतिक दल नहीं, बल्कि विभिन्न कार्यकर्ताओं, पेशेवरों और स्वयंसेवकों का अभियान-मंच था। इसी लचीले ढाँचे ने उसे तेजी से फैलाया, लेकिन दीर्घकालिक दिशा और निर्णय-प्रक्रिया पर मतभेद भी पैदा किए।
गठन और प्रमुख चेहरे
भ्रष्टाचार-विरोध और जनलोकपाल की मांग पर अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी, प्रशांत भूषण, शांति भूषण, संतोष हेगड़े, मनीष सिसोदिया, स्वामी अग्निवेश और अन्य कार्यकर्ता साथ आए। अन्ना हजारे नैतिक नेतृत्व का केंद्रीय प्रतीक बने।
अभियान की सदस्यता और निर्णय-प्रक्रिया किसी औपचारिक दल जैसी नहीं थी। यही कारण है कि ‘टीम अन्ना’ और IAC शब्द कई बार परस्पर बदलकर उपयोग हुए।
सोशल मीडिया और स्वयंसेवक नेटवर्क
SMS, फेसबुक, ट्विटर, ऑनलाइन पंजीकरण और स्थानीय स्वयंसेवक समूहों ने अभियान को पारंपरिक संगठन के बिना राष्ट्रीय विस्तार दिया। तिरंगा, गांधी टोपी और ‘मैं अन्ना हूँ’ जैसे प्रतीकों ने साझा पहचान बनाई।
टीवी समाचार ने आंदोलन को लगातार दृश्यता दी। समर्थकों ने इसे नागरिक भागीदारी का लोकतंत्रीकरण माना; आलोचकों ने मीडिया-केंद्रित शहरी लामबंदी कहा।
नेतृत्व और रणनीति पर विवाद
सरकार से वार्ता, राजनीतिक दलों से दूरी, मसौदे की भाषा और सार्वजनिक बयानों पर टीम के भीतर मतभेद उभरे। कुछ सदस्यों के प्रस्थान और आरोपों ने संगठन की सामूहिकता को प्रभावित किया।
अभियान की तेज गति ने संस्थागत नियम विकसित करने के लिए कम समय दिया। आंदोलन की लोकप्रियता कम होते ही यह कमजोरी अधिक स्पष्ट हुई।
आंदोलन या राजनीतिक दल?
एक पक्ष का मानना था कि चुनावी राजनीति में प्रवेश किए बिना व्यवस्था बदलना कठिन है। अन्ना हजारे राजनीतिक दल बनाने के विरोध में थे और आंदोलन को दलनिरपेक्ष रखना चाहते थे।
मतभेद के बाद अरविंद केजरीवाल और सहयोगियों ने राजनीतिक विकल्प की दिशा अपनाई; नवंबर 2012 में आम आदमी पार्टी बनी।
केंद्रीय टीम और स्थानीय नेटवर्क
राष्ट्रीय स्तर पर कुछ प्रमुख चेहरे रणनीति, मीडिया और वार्ता का नेतृत्व करते थे, जबकि शहरों में स्वयंसेवक समूह प्रदर्शन, हस्ताक्षर अभियान और जनसंपर्क चलाते थे। इस ढाँचे ने कम समय में बड़ी पहुँच संभव बनाई।
फिर भी सदस्यता, वित्त, स्थानीय प्रतिनिधित्व और आंतरिक निर्णय के स्थायी नियम स्पष्ट नहीं थे। आंदोलन की लोकप्रियता के दौरान यह समस्या दब गई, लेकिन राजनीतिक दिशा के प्रश्न पर वही कमजोरी निर्णायक बनी।
IAC का अनुभव बताता है कि डिजिटल लामबंदी तेजी से जनसमर्थन जुटा सकती है, पर दीर्घकालिक आंदोलन के लिए पारदर्शी संगठन, नेतृत्व उत्तराधिकार और असहमति निपटाने की प्रक्रिया आवश्यक होती है।
IAC ने भारत में नेटवर्क-आधारित नागरिक आंदोलन की नई शैली स्थापित की। उसकी असाधारण संचार क्षमता के विपरीत औपचारिक संगठन और साझा दीर्घकालिक रणनीति कमजोर रही। यही विरोधाभास उसकी सफलता और विघटन—दोनों की व्याख्या करता है।