नई दिल्ली के कनॉट प्लेस और संसद मार्ग के पास स्थित जंतर-मंतर मूलतः कोई धरना-स्थल नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक खगोलीय वेधशाला है। इसका निर्माण जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने लगभग 1724 में कराया था।

यह जयसिंह द्वारा दिल्ली, जयपुर, उज्जैन, मथुरा और वाराणसी में बनवाई गई पांच खगोलीय वेधशालाओं में से एक है। यहां बने विशाल यंत्रों का उपयोग सूर्य और तारों की स्थिति, स्थानीय समय, ग्रहों की गति तथा खगोलीय गणनाओं के लिए किया जाता था। इसके प्रमुख यंत्रों में सम्राट यंत्र, जयप्रकाश यंत्र, राम यंत्र और मिश्र यंत्र शामिल हैं।

धरना-प्रदर्शनों का स्थल कैसे बना?

स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक दिल्ली में बड़े राजनीतिक प्रदर्शन और किसान रैलियां राजपथ—अब कर्तव्य पथ—के निकट बोट क्लब मैदान में आयोजित होती थीं। सरकार और संसद के निकट होने के कारण यह क्षेत्र आंदोलनों का प्रमुख केंद्र बन गया था।

अक्टूबर 1988 में भारतीय किसान यूनियन के नेता महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में लाखों किसानों ने बोट क्लब और आसपास के क्षेत्र में कई दिनों तक डेरा डाल दिया। इससे मध्य दिल्ली की यातायात और सुरक्षा व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ा। इसके बाद राम जन्मभूमि आंदोलन तथा अन्य बड़े राजनीतिक प्रदर्शनों के दौर में सरकार ने बोट क्लब क्षेत्र में सभाओं और प्रदर्शनों पर कड़ी पाबंदियां लगा दीं।

क्या जंतर-मंतर को 1993 में “अधिकृत” घोषित किया गया था?

सामान्यतः कहा जाता है कि 1993 से जंतर-मंतर दिल्ली का अधिकृत या निर्धारित धरना-प्रदर्शन स्थल बना। लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी आवश्यक है: जंतर-मंतर को धरना-स्थल घोषित करने वाला कोई स्पष्ट अध्यादेश, कानून अथवा अलग राजपत्र अधिसूचना उपलब्ध नहीं मिलती।

वास्तव में 1993 में बोट क्लब पर बड़े प्रदर्शनों को रोकने के बाद दिल्ली पुलिस और प्रशासन ने जंतर-मंतर रोड पर नियंत्रित धरनों की अनुमति देना शुरू किया। मध्य दिल्ली के अधिकांश संवेदनशील क्षेत्रों में धारा 144 लागू रहती थी, जबकि जंतर-मंतर पर पूर्व अनुमति के साथ प्रदर्शन किए जा सकते थे। इस तरह वह किसी औपचारिक विधायी घोषणा से नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था और निरंतर सरकारी व्यवहार के माध्यम से निर्धारित प्रदर्शन-स्थल बन गया।

तथ्यात्मक सावधानी

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 के निर्णय में दर्ज किया कि 1993 से जंतर-मंतर वह प्रमुख स्थान था जहां विरोध-प्रदर्शनों की अनुमति दी जाती रही। लेकिन न्यायालय ने किसी अलग अध्यादेश या राजपत्र अधिसूचना का उल्लेख नहीं किया।

जंतर-मंतर ही क्यों चुना गया?

  • संसद और केंद्रीय मंत्रालयों के नजदीक होने से आंदोलन की आवाज सरकार तक पहुंचती है।
  • बोट क्लब की तुलना में यहां जगह सीमित है, इसलिए बहुत बड़ी भीड़ जमा करना कठिन है।
  • क्षेत्र में प्रवेश और निकास के सीमित रास्ते होने से पुलिस के लिए सुरक्षा प्रबंधन आसान रहता है।
  • कनॉट प्लेस और मेट्रो के पास होने के कारण देशभर से आने वाले प्रदर्शनकारियों एवं मीडिया के लिए यह सुलभ है।
  • आंदोलन को राजनीतिक दृश्यता मिलती है, लेकिन संसद और प्रमुख सरकारी कार्यालय सीधे अवरुद्ध नहीं होते।

2017 का प्रतिबंध

5 अक्टूबर 2017 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण—NGT—ने ध्वनि प्रदूषण, गंदगी और स्थानीय निवासियों को होने वाली परेशानी के आधार पर जंतर-मंतर क्षेत्र में धरना-प्रदर्शनों पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया। प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान भेजने का निर्देश दिया गया।

2018 में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय

23 जुलाई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने जंतर-मंतर और बोट क्लब पर प्रदर्शनों के पूर्ण प्रतिबंध को अनुचित माना। न्यायालय ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध और सभा की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) से जुड़ा मौलिक अधिकार है। हालांकि यह अधिकार निरंकुश नहीं है—इसे स्थानीय निवासियों के शांतिपूर्ण जीवन, यातायात, सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था के साथ संतुलित करना होगा।

न्यायालय ने दिल्ली पुलिस को प्रदर्शनों के नियमन के लिए दिशा-निर्देश बनाने को कहा। इसका अर्थ यह नहीं था कि कोई भी व्यक्ति कभी भी वहां धरना दे सकता है; पूर्व पुलिस अनुमति और निर्धारित शर्तें आवश्यक बनी रहीं।

निष्कर्ष

जंतर-मंतर 1993 से दिल्ली का प्रचलित और प्रशासन द्वारा निर्धारित धरना-प्रदर्शन स्थल बना, लेकिन इसे अधिकृत घोषित करने वाली कोई स्पष्ट अलग अधिसूचना या अध्यादेश सामने नहीं आता। बोट क्लब पर प्रदर्शनों की पाबंदी के बाद प्रशासन ने जंतर-मंतर पर नियंत्रित और अनुमति-आधारित प्रदर्शनों की व्यवस्था शुरू की। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने यहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार को बहाल करते हुए उसे पुलिस नियमों और उचित प्रतिबंधों के अधीन रखा।

इस प्रकार जंतर-मंतर की दो पहचान हैं—एक 18वीं शताब्दी की वैज्ञानिक विरासत और दूसरी आधुनिक भारत में लोकतांत्रिक असहमति तथा जनप्रतिरोध का प्रतीक।

प्रमुख स्रोत

सुप्रीम कोर्ट: Mazdoor Kisan Shakti Sangathan बनाम Union of India, 23 जुलाई 2018 ↗University of Delhi: जंतर-मंतर, नई दिल्ली ↗